स्वाभिमान

बादल संकट के घिरे या,

अवसाद की वर्षा आयी,

समझौता स्वाभिमान से मैं,

कभी ना कर पायी।

देखा है मैंने लोगों को बदलते,

निज स्वाभिमान को तजकर,

मौसम के अनुरूप ढलते।

ऐसे द्विभाषी लोगों से मैं,

कभी न मित्रता कर पायी।

समझौता स्वाभिमान से मैं

कभी न कर पायी....

प्रभु सुमिरन मेरा धर्म,

अभिमान न करना कभी

सिखाते हमारे वेद-ग्रंथ।

वो इंसान ही क्या जो,

मतलबपरस्त बन जाये,

बेपेंदी सा हर तरफ लुढ़क जाये।

अपने उसूलों को ताख पर रखकर

झूठी तारीफ न कर पायी।

समझौता स्वाभिमान से मैं

 कभी न कर पायी...

देर सही पर दूर नहीं सफलता उनसे,

चलते सदा जो स्वाभिमान के पथ पे।


डॉ0 रीमा सिन्हा (लखनऊ)