महिलाओं को लेकर दकियानूसी सोच के खिलाफ एक आवाज है फिल्म 'धक धक'

मुंबई। रोड से देश-दुनिया घूमने पर हिंदी सिनेमा में 'जिंदगी ना मिलेगी दोबारा', 'दिल चाहता है', 'तमाशा', 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' समेत तमाम फिल्में बनी हैं। हालांकि, महिलाओं के सफर करने पर क्वीन, हाइवे, चलो दिल्ली जैसी कुछ फिल्में हैं। इनमें से हाइवे फिल्म पूरी तरह से रोड ट्रिप पर आधारित नहीं थी। आगामी दिनों में अभिनेता और निर्देशक फरहान अख्तर 'जी ले जरा' फिल्म बनाने की तैयारी में हैं, जो महिलाओं के रोड ट्रिप के आसपास बुनी जाएगी। खैर, अब इन फिल्मों में अभिनेत्री तापसी पन्नू के प्रोडक्शन कंपनी में बनी फिल्म धक धक भी शामिल हो गई है।

कहानी चार अलग उम्र और परिवेश से आती महिलाओं के आसपास है। शशि कुमार यादव उर्फ स्काय (फातिमा सना शेख) ट्रैवल व्लॉगर है। उसे एक ऐसा वीडियो बनाना है, जिससे उसका करियर संभल सके। उसे पता चलता है कि उम्रदराज महिला मनजीत कौर सेठी उर्फ माही (रत्ना पाठक शाह) बाइक चलाती है।

माही को बाइक से लेह के खारदुंगला जाना है, जो भारत की सबसे ऊंची सड़कों में से एक मानी जाती है। स्काय को ऑन रोड मैकेनिक की जरूरत पड़ती है। एक गैरेज में उसकी मुलाकात उज्मा (दीया मिर्जा) से होती है, जो कभी अपने पापा का गैरेज संभालती थी, लेकिन शादी के बाद गृहणी बनकर रह गई है।

इन तीनों के साथ जुड़ती है मंजरी (संजना सांघी), जिसकी शादी उसकी मां की पसंद से तय हो चुकी है। स्काय को इन तीनों महिलाओं के साथ खारदुंगला सात दिनों में पहुंचना है। रास्ते में इन चारों के अतीत और वर्तमान की कहानियों को दिखाते हुए फिल्म आगे बढ़ती है।

इस फिल्म की सबसे अच्छी बात यह है कि कहानी साधारण है, पर असर छोड़ती है। कोई सस्पेंस नहीं है। शुरू से ही दर्शक अंदाजा लगा सकते हैं कि आगे क्या-क्या हो सकता है। फिर भी तरुण डुडेजा और परिजात जोशी की लिखी यह कहानी बांधे रखती है।

फिल्म महिलाओं की इच्छाओं, आकांक्षाओं, खुद को बार-बार साबित करने की जद्दोजहद, उन्हें कमतर आंकने वालों की सोच जैसे कई मुद्दों को छूते हुए आगे बढ़ती है।

रोड ट्रिप वाली फिल्मों की सबसे बड़ी खासियत उसके विजुअल्स होते हैं। सिनेमैटोग्राफर श्रीचित विजयन दामोदर ने न केवल लेह के रास्तों के विजुअल्स खूबसूरती से कैद किए हैं, बल्कि सफर के दौरान दीवारों पर दिखने वाले स्लोगन को भी बैकग्राउंड में शूट किया है।

कुछ सवाल अनुत्तरित भी रह गए कि अंतर्मुखी मंजरी सोलो ट्रिप के लिए एक झटके में कैसे तैयार हो जाती है? बाइक से रोड ट्रिप पर जाना ही इस फिल्म का सबसे अहम पहलू है, ऐसे में मंजरी और उज्मा की भी बाइक चलाने को लेकर एक छोटी सी कहानी की जरूरत महसूस होती है।

इसके साथ ही तरुण ने रोड ट्रिप के दौरान अनजानों के बीच की मजेदार बातचीत, खाने के पैसे को लेकर झिकझिक जैसी कई चीजों को भी जोड़ा है। देख आंटी बाइक चला रही है... इस संवाद पर माही का पलटकर कहना कि देख देख लड़का स्कूटर चला रहा है... उस नारी की झलक दिखाता है, जो बेचारी नहीं है।

बाइक से लेह जाना है, आपके साथ कोई जेंट्स तो जा रहा होगा ना... यह उस सोच पर प्रहार करता है, जहां महिलाओं को पुरुषों के अधीन माना जाता है। उम्रदराज महिला का खुद को अपने बच्चों और पोते-पोतियों के सामने साबित करने की जद्दोजह को रत्ना पाठक शाह सच्चाई से निभाती हैं।

दीया मिर्जा उज्मा के किरदार में उस महिला का प्रतिनिधित्व बखूबी करती हैं, जो परिवार के लिए चुप जरूर है, लेकिन जरूरत पड़ने पर आवाज उठाती है। ऊपर से मजबूत, लेकिन अंदर से टूटी हुई लड़की की भूमिका में फातिमा सना शेख जंची हैं।

संजना सांघी का किरदार भले ही कमजोर लिखा गया हो, लेकिन वह अपने अभिनय से उसे संभाल ले जाती हैं। रे बंजारा... है बेपरवाह... गाना रोड ट्रिप के प्रसिद्ध गानों में शामिल होने का दम रखता है।