मां गौरी का दृढ़ निश्चय

अगर दृढ़ निश्चय हो तो कुछ भी पाना असंभव नहीं होता है

ये बातें हमने हरतालिका तीज व्रत की कथा में पढ़ी है। हरतालिका तीज यूंँ तो बिहार ,झारखंड और उत्तर प्रदेश में बहुतायत में मनाया जाता है। हरतालिका तीज में सोलह श्रृंगार कर सौभाग्यशाली स्त्रियां अपने पति की लंबी आयु एवं परिवार के सुख सौभाग्य के लिए निर्जला ,निराहार रहकर (बिना पानी पिए ,बिना कुछ खाए) दिन-रात उपवास रहकर करती है‌। बिहार के कुछ क्षेत्रों में कुंवारी लड़कियां भी इस व्रत का संकल्प अच्छे और सुंदर पति पाने के लिए करतीं है।

 इस व्रत में स्त्रियां चौंकी पर मिट्टी का शंकर भगवान, गणेश भगवान, और माता पार्वती की मूर्ति बनाकर, उन मूर्तियों को रंग बिरंगे कपड़े पहनातीं हैं। चौकी को तरह-तरह के खुशबूदार फूलों से सजा कर पूजा करतीं हैं।रात्रि भर जागरण कर शंकर पार्वती जी का गीत गाती है ,कहते हैं उस रात्रि को स्त्रियां जागकर ही गुज़ार देती हैं । सुबह तड़के उठकर स्नान ध्यान कर फिर से पूजा कर , अगले वर्ष फिर से आने का न्योता देकर उन मूर्तियों का विसर्जन कर देतीं हैं। 

इसके बाद ब्राह्मण को दक्षिणा और भोजन का सीधा देखकर ही सब स्त्रियां अपना व्रत खोलतीं हैं।

जैसा कि तीज व्रत कथा में कहा गया है की पार्वती जी शंकर जी को पति स्वरूप पाने के लिए सौ वर्षों तक कठिन तपस्या की थी। वो शंकर जी को पति रूप में पाने के लिए अपने पिताजी से भी रूठ कर हिमालय पर्वत पर घने जंगल में चली गई थी ,और वहां जाकर शंकर जी की बालू की प्रतिमा बनाकर पूजा आराधना करने के साथ-साथ घोर तपस्या की थीं। शंकर जी को पाने के लिए पार्वती माता कभी सूखे पत्ते खाकर कभी पान कभी, दुर्वा के पत्ते खाकर तो कभी ,धुआं पीकर शंकर जी को पति के रूप में पाने के लिए तप करने लगीं, और अपने दृढ संकल्प पर टिकी रहीं और तो और अपने पिता के सामने भी यह हठ करतीं रहीं, कि मुझे हर हाल में सिर्फ शंकर जी से हीं शादी करनी है।

आखिरकार पार्वती जी अपने पिता से भी अपनी बात मनवा लीं और उनके दृढ़ निश्चय के कारण शंकर जी भी नतमस्तक होकर पार्वती जी को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिए।।

अर्चना भारती नागेंद्र 

पटना सतकपुर सरकट्टी बिहार