हरे कृष्णा

जय श्री राधे- जय श्री कृष्णा

हम सभी श्री कृष्ण के बारे में बहुत कुछ जानते हैं उनके जीवन की कथाओं से परिचित हैं और उनको पूजते है ।

लेकिन आज प्रभु का जन्मदिन है तो मैंने भी परमेश्वर जगद्गुरु श्री कृष्ण के बारे में कुछ लिखा जिसे आप सब भी पढ़िए जो कि मेरी आगामी पुस्तक_ "श्री कृष्ण दर्शन "का अंश भी है

उस विराट को मै तृण लिखूं कैसे ?इतना विराट व्यक्तित्व जो सागर से करोड़ों गुना गहरा है, जो सूर्य से कोटिशः चमत्कृत है मेरे शब्द कैसे बखान करेंगे, परंतु यह विश्वास है यदि उस विराट श्री कृष्ण के प्रति सच्चा प्रेम मेरे हृदय में है तो निश्चय ही वह मेरे शब्दों से झाकेंगे और जब कभी किसी कृष्ण भक्त की दृष्टि इस लेखनी पर पड़ेगी तो उसे भी मेरे इष्ट के दर्शन अवश्य होंगे। सच्चे भक्तों से इनका प्रेम भक्तों के जीवन में जरूर दिख जाता है चाहे कितनी भी विषमताएं क्यों न हो ।

हम नहीं चुनते श्री कृष्ण को श्री कृष्ण ही हमारे जन्मों के पुण्य कर्मों के फलस्वरुप अपनी भक्ति के लिए हमारा चुनाव करते हैं।

मानव समाज में कृष्ण भक्ति अमृत का विस्तार अनिवार्य है, क्योंकि यह जीवन को चरम सिद्धि प्रदान करने वाला है। प्रत्येक व्यक्ति को जानना चाहिए कि श्री कृष्ण महान है और जीवो की वास्तविक स्थितिया क्या हैं? (क्षणभंगुर) 

प्रत्येक व्यक्ति को जानना चाहिए कि जीव सिर्फ सेवक है, जब तक श्री कृष्ण की सेवा नहीं करेगा वह जन्म मृत्यु में पड़ा रहेगा। यह ज्ञान महा विज्ञान है और हर प्राणी को अपने हित के लिए श्री कृष्ण को पढ़ना और सुनना चाहिए क्योंकि पूर्णता का नाम श्री कृष्ण है।

श्री कृष्ण निष्काम योगी, कर्मयोगी ,दार्शनिक एवं दैवी संपदा से सुसज्जित महापुरुष थे।द्वापर युग में इस युग पुरुष का जन्म हुआ। वेदव्यास द्वारा रचित 'श्रीमद्भागवद 'और 'महाभारत' में कृष्ण का चरित्र विस्तृत रूप से लिखा गया है।कृष्ण अर्जुन संवाद पर आधारित ग्रंथ भगवद्गीता संपूर्ण विश्व में प्रसिद्ध है। 

इस कारण इनको जगतगुरु भी कहा जाता है।

भगवान श्री कृष्ण मेघ श्याम वर्ण के थे जैसे कि सूर्यास्त के बाद आसमान का रंग काला और नीला हो जाता है वही रंग श्री कृष्ण का था। कृष्ण एक संस्कृत शब्द है जो काला या अंधेरा का समनार्थी है,अंधकार से इसका संबंध ढलते चंद्रमा के समय 'कृष्ण पक्ष' कहे जाने से भी स्पष्ट झलकता है। कृष्ण का आशय कहीं-कहीं अति आकर्षक के रूप में भी लिया गया है।यह भी माना जाता है की समस्त ब्रह्मांड को समाहित करने की क्षमता होने के कारण उनका आभामंडल नीला हो गया था।प्रचलित जनश्रुति के अनुसार उनके शरीर से मधुर गंध निकलती रहती थी।

कर्म योगी भगवान श्री कृष्ण की वाणी गीता में कर्मयोग का बहुत बड़ा महत्व है। श्री कृष्ण ने जो भी कार्य किया उसे अपना कर्म समझा । श्री कृष्ण ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पूर्ण जीवन को जी कर दिखाया और सभी जिम्मेदारियों का साथ- साथ पालन भी किया। ना अतीत में ना भविष्य में उनका चमत्कृत जीवन जहां है वहीं से पूरी सघनता के साथ चमकता दिखाई देता है, जो कि अपने आप में एक बहुत बड़ा संदेश पूरी मानव जाति के लिए है।श्री कृष्ण ने धर्म की स्थापना के लिए कहा कि जब-जब धर्म की हानि होगी तब तब धर्म के उत्थान के लिए मैं धरती पर आता रहूंगा।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

श्री कृष्ण के बचपन की सखी और प्रेमिका 'राधा ' कृष्ण को बिल्कुल अलग रूप में देखती थी,क्योंकि उनके पास कृष्ण हेतु अनन्य प्रेम,श्रद्धा थी। जहां कृष्ण को ईश्वर का प्रतीक माना जाता है तो वही श्री राधा जी को प्रेम का विराट प्रतीक माना जाता है। दोनों की जोड़ी आध्यात्मिक दर्शन का रूप है।अर्थात जब भक्त अगाध प्रेम से भर जाए संशय का कोई निशान ना हो तब वह भक्त स्वयं राधा हो जाता है प्रेम की सर्वोत्तम पराकाष्ठा ही राधा का रूप है और ईश्वर रूप श्री कृष्ण हैं। ईश्वर एवं प्रेम दोनों एक दूसरे के पूरक है।

जय श्री राधे जय श्री कृष्णा

वह प्रेम का नित रूप लेकर

जगत को गीता ज्ञान देकर,

है अधर पर मुस्कान सुंदर

मेरा जीवनधन है गिरधर।

भक्ति का प्रखर प्रकाश सुंदर

बिखेर रहा मन की धरा पर,

मोहिनी मुस्कान है जिसकी

आज उसकी दृष्टि है मुझपर ।

काव्या विकल है बावरी सी

निकट भोर की विभावरी सी,

हैं दृग चकित आलोक कैसा

उर में जगा क्या 'कृष्ण' जैसा!

इस धरती से उस अंबर तक

प्रभात से अमां की रात्रि तक,

उसका गुण -रूप प्रकाश में

इस भव सिंधु के आभास में।

उदित होता दिनमान जिससे

मन है अचंभित आज उससे,

मन दुग्ध मंथन नवनीत छवि

शब्दों से अर्चन करता कवि।

श्याम वर्ण,परिधान पितांबर 

मुख नीरज ,बंसी अधरों पर,

सुंदर सलोने घन रूप सम

माया जिसकी इस सृष्टि पर।

अहो !मैं कैसे करूँ बखान

मैं,अकिंचन तृण के समान,

वह विराट है कितना महान

धरा की नियति जिसका विधान।

उत्कृष्ट सृष्टि का सृष्टिकर्ता

अब कर अनुग्रह हे दोष हर्ता,

पाकर तुझे निहाल हो जाऊँ,

भव सागर से तर मैं जाऊँ।,

वह प्रेम रूप भक्ति भूमि है

वाद्ययंत्र में मृदंग ध्वनि है,

इस मन पर छाया है उसकी 

पवित्र हुई हिय की अवनि है।।

आप सभी को श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व की कोटि-कोटि शुभकामनाए।

परमेश्वर श्री कृष्ण का आशीर्वाद और कृपा हम सभी के ऊपर बरसे और हम सभी सच्चे भक्ति और आनंद के मोतियों से सराबोर हो जाए। अपने जीवन को सार्थकता की तरफ मोड़ लें अपने जीवन को श्री कृष्ण की भक्ति की तरफ मोड़ लें।

जय-जय श्री राधे जय-जय श्री कृष्णा।

अंजनी द्विवेदी (काव्या)

देवरिया,उत्तर प्रदेश