शिक्षकों का सामान्य अभिवादन करें ,चरण स्पर्श न करें

यह नोटिस की तरह पटना विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में कहीं दीवार पर कागज़ पर लिख कर चिपकाया गया है।

जिसे पढ़कर देश की संस्कृति व संस्कारों से नफरत करने वाले बेहद प्रसन्न दिखाई दे रहे और इस दो पंक्ति की सूचना पर लम्बे-लम्बे आलेख लिख रहे क्योंकि, उन्हें बुरी प्रथा कह-कहकर इस देश से हर वो संस्कार मिटाना जिसकी वजह से यह देश अब तक टिका हुआ और विदेशों में भी अपनी अलग पहचान कायम कर रहा है । ज़ाहिर सी बात जब आपका आधार स्तंभ आपके संस्कार ही न रहेंगे तब त्रिशंकु से अधर में लटके लोगों को मिटाना आसान होगा । जिसके लिए सदियों से प्रयास किये जा रहे और मैकाले के नाम पर शिक्षा पद्धति तक में इतने बदलाव किए गए कि धीरे-धीरे अन्य कोई तो नहीं मगर, हिन्दू समाज अपनी वास्तविक पहचान खोते-खोते अब नाममात्र का हिन्दू रह गया है । जो माथे पर तिलक, सर पर पगड़ी या टोपी, कंधे पर जनेऊ, शरीर पर भारतीय पहनावा और नमस्कार, प्रणाम, राम-राम, पालथी मारकर बैठना, धरती पर बैठकर हाथों से खाना, मंदिर जाना जैसी अपनी आदतों से बहुत दूर जा चुका है । अब कभी-कभार मंदिर जाना या ऐसा कुछ करना पड़ जाए तो उसे आउट डेटेड लगता मगर, किसी दूसरे समुदाय ने अपने धर्म में मान्य जीवन शैली को नहीं त्यागा न उससे दामन छुड़ाया इसलिए वह दोनों धरातलों पर मजबूती से कदम जमाये हुए है ।

ऐसे समय में एक अन्य खबर को भी पढा जाना चाहिए ओलंपिक में भारत को स्वर्ण पदक दिलाकर उसका गौरव बढाने वाले जैवलिन थ्रोअर नीरज चोपड़ा जिन्होंने हाल ही में स्वीडन के स्टॉकहोम में डायमंड लीग में शानदार प्रदर्शन करते हुए अपने ही राष्ट्रीय कीर्तिमान को ध्वस्त करते हुए नया नेशनल रिकॉर्ड बनाकर पुनः हम सबको गौरवान्वित होने का अवसर दिया है । फिलहाल चर्चा उनकी इस उपलब्धि से अधिक उनके एक शार्ट वीडियो को लेकर हो रही जो यह स्टॉकहोम का ही है । अभी यह सोशल मीडिया में जबरदस्त वायरल हो रहा जिसे हर कोई साझा कर उनकी विनम्रता की तारीफ कर रहा और उन्हें दिल से दुआएं दे रहा है । जिसमें उनके प्रशंसक उन्हें रोककर उनके साथ बात करते और फोटो खिंचवाते देखे जा सकते हैं । जिसके बाद वे अपने फैंस से कहते हैं कि, बस उनका इंतजार कर रही है उन्हें जाना होगा और जाने से पहले वे वहीं खड़े बीकानेर के एक बुजुर्ग फैन के पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं और दौड़कर अपनी बस की तरफ चले जाते हैं । तब पीछे से एक आवाज आती कि, नीरज जमीन से जुड़े व्यक्ति है उनके पास सोने का दिल है । इसके पूर्व वह हिन्दी भाषा व भारतीय झंडे के प्रति अपने प्रेम व अपनी सादगी से हर किसी का दिल जीत चुके और अब उनके यह संस्कार उन्हें परदेस में भी लोकप्रिय व हरदिल अज़ीज बना रहे है । इस तरह सबके पसंदीदा बनने के लिए शिक्षा भले कम हो लेकिन, यदि आप डाउन टू अर्थ व संस्कारयुक्त है तो अपने शालीन व्यवहार से आप किसी को भी अपना बना सकते है । ऐसा न हो इसलिए पटना बिहार जैसी देशज जगह जहां अब भी परम्पराएं शेष में ऐसे प्रयोग किये जा रहे व ऐसे निरर्थक वाक्यों को वायरल कर अन्य जगह भी ऐसा ही किये जाने की दुर्भावना से लेख लिखे जा रहे तब यह वीडियो व प्रसंग भी सबके समक्ष आना जरूरी है ।

यदि आपको किसी भी संस्कार का वैज्ञानिक पहलू ज्ञात नहीं तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि आप उसे खारिज़ करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा के पीछे पड़ जाए बल्कि, यह जानने की कोशिश करें कि हमारे यहां बड़े-बुजुर्ग या गुरुओं का अभिवादन चरण स्पर्श करने के पीछे आखिर, क्या मंशा रही होगी । वह नहीं जो आप प्रचारित कर रहे कि यह वर्णभेद और गुलाम मानसिकता का प्रतीक चूंकि, जातिवाद आपके रक्त में इस तरह समा गया कि आपको इसके इतर कुछ दिखाई नहीं देता है । अन्यथा यह बड़ो के द्वारा मंगल कामना व आशीष पाने का ऐसा जरिया जिसके कारण पैर छूने वाले को जुग-जुग जियो, पूतो फलो, सदा खुश रहो, आयुष्मान भव, बड़े आदमी बनो, सफल हो, अपने स्वप्न पूर्ण करो, जो चाहो वो पाओ जैसे मंगलकारी आशीर्वाद सुनने मिलते थे । जिनका बड़ा ही मनोवैज्ञानिक सकारात्मक प्रभाव सुनने वाले पर पड़ता जिससे उसकी नकारत्मकता व निराशा दूर होती और वह पुनः एक नूतन उत्साह-उमंग से भर जाता है । यह सब अब खत्म होते जाने के कारण हम देख रहे कि पहले जो बच्चे अपने घर से अपने बड़ों का आशीर्वाद लेकर घर से निकलते वे उन सकारात्मक तरंगों की छांव में कुशलतापूर्वक लम्बा जीवन व्यतीत करते पर, अब तो अल्पायु व जवानी में ही मरने की खबरें आ रही हैं । माना कि, आशीष पाने वाले भी कभी-कभी दुर्घटना के शिकार हो जाते मगर, कहीं न कहीं बच जाते पर, अब पैर की जगह घुटने छूकर परम्परा  की औपचारिकता निभाने वाले नहीं समझ सकते कि कैसे बड़ों के अंतस से निकली यह दुआएं उनके जीवन को बदल देती है । इसलिए नीरज चोपड़ा जैसे संस्कारी को अपना आदर्श बनाये न कि उन संकीर्ण मानसिक लोगों को जो आपको आशीष विहीन कर आपकी कुशलता की कामनाओं को आपसे छीन लेना चाहते हैं । सबसे यही कहना चाहती हूं कि, संस्कार विहीन न बनें अपने बड़े-बुजुर्ग व शिक्षकों का चरण स्पर्श कर आशीष बटोरें जी न जाने कहाँ किस बुरी  घड़ी में कवच की तरह आपकी रक्षा करें क्योंकि, दिल से निकली कोई भी दुआ कभी व्यर्थ नहीं जाती है ।

-सुश्री इंदु सिंह 'इंदुश्री'

नरसिंहपुर (म.प्र.)