वो दिन कहाँ गए..?

दब गए जिम्मेदारियों के बोझ में।

हंसते खेलते वो दिन कहाँ गए?

मां की लोरियां, प्रेम दुलार

ममता भरे वो दिन कहाँ गए?

पिता के बाहों में झूला झूलते,

बचपना के वो दिन कहाँ गए?


दादी जी की लाठी का सहारा।

मैं था मां की आँखों का तारा।।

छोटा सा था संसार हमारा।

समाया था जिनमें खुशियां सारा।।

चवन्नी अठन्नी की पोटलियां

दादा जी के वो दड़बे कहाँ गए?


कंधों में वो नागर का भार,

जोड़ी बैलों के वो दिन कहाँ गए?

धान कूटते निकलते चावल,

मूसर ढेकी के वो दिन कहाँ गए?


गिल्ली डण्डे खेलती बचपन।

अब बन्द कमरों में कैद हुए।।

भौंरे-कंचों के वो दिन कहाँ गए?

हर घर में थी मिट्टी के चूल्हे

उड़ते धुओं के वो दिन कहाँ गए?

पनहारिनों की भीड़ दिखते,

वो कुओं का पानी कहाँ गए?


स्वरचित रचना

देवप्रसाद पात्रे

मुंगेली, छत्तीसगढ़

मो.न. 9300085203