ग़ज़ल : कोई चौपाल अब दिखता नहीं है

जहाँ मसरूफ़ है रुकता नहीं है

कोई चौपाल अब दिखता नहीं है


मुहब्बत घर में जो कायम था रखता

वो चुल्हा शहर में जलता नहीं है


इसे आदत है अब खामोशियों की

ये दिल रोता मगर कहता नहीं है


किसे नालाँ सुनाए जाके अपना 

बुढ़ापे की कोई सुनता नहीं है


कई लाशें है मिलती भ्रुण की क्यूँ

अरे क्या माँ में अब ममता नहीं है


बशर की बस्तियों में दिल कहीं भी

हमें तो आजकल मिलता नहीं है


परस्तिश कर लो रब की चाहे कितनी

बुरे कर्मों का फल फलता नहीं है


प्रज्ञा देवले✍️