एक नदी ठहरी हुई

हमारे शहर में एक नदी ठहरती है। ठहरती इसलिए है कि वह कूड़े-कर्कट के बोझ से बहना भूल चुकी है। उसी के प्रक्षालन के बारे में समाचार पत्र में कुछ छपा था। मैं पढ़ने ही वाला था कि मेरा पड़ोसी आ धमका। कहने लगा – सुनते हो! जिस नदी का हम कभी पानी पिया करते थे, उसे फिर से पीने लायक बनाने के लिए सरकार जोर-शोर से काम कर रही है। 

मुझे इस जीवन में पूरा विश्वास हो चला था कि जिसके पास ठहरना तो दूर गुजरना भी मौत को दावत देने से कम नहीं, उस नदी का कोई कुछ नहीं कर सकता। लेकिन मैं गलत था। अभी-अभी मैंने पुल के पास देखा कि एक बहुत बड़ी जाली से उसे कुछ इस तरह से घेर दिया गया है कि कोई उसमें कचरा न फेंक सके। और तो और हँसते हुए गांधी जी के साथ एक बड़ी सी ऐनक वाली फ्लेक्सी लगा दी गई है। नीचे लिखा है – ‘स्वच्छ भारत स्वस्थ भारत’।  

मैंने भौंहे चढ़ाते हुए कहा – अच्छा! यह तो बड़े कमाल की बात है। मैं तो सोचता था कि हमारे शहर का कचरा ढोने का जिम्मा इसी के भरोसे पर है। मानो घर-घर जाकर कूड़ा-कर्कट जमा कर रही हो। चलो जैसे-तैसे इसके दिन तो फिरे। बहुत जल्द इसके किनारे फल-फूलों के पेड़ लगेंगे। हरियाली फैलेगी। प्रेमी जोड़ियों के लिए भव्य वातावरण सजेगा। ऐसे में रूहानी रोमांस का अहसास होना स्वाभाविक होगा।

पड़ोसी ने कहा - 'सो तो है, पर वहाँ एक बोर्ड भी लगा है-चेतावनी वाला।' 'वह तो समाचार पत्र में भी छपा है। सरकारी चेतावनी-इस नदी में कूड़ा फेंकना मना है। उल्लंघन करने पर दो हजार रुपये का जुरमाना।‘...ठीक है, पर्यावरण की सुरक्षा के लिए सख्ती जरूरी है।' लेकिन उसी समाचार के नीचे एक और खबर छपी है - ‘बोर्ड के बगल में जालीनुमा एक खिड़की है-जाली काटकर बनाई गई है, बिल्कुल उतनी ही साइज की, जितनी चेतावनी पट की है। और आसपास प्लास्टिक एवं पुराने लत्ते की पोटलियाँ टंगी हैं। वहाँ से गंदगी बराबर फेंकी जा रही है। कानून का बाईपास, कानून के पास ही। 

जैसा कि देश के हर कानून के साथ उसे बाईपास करने की सुविधा भी सहज ही उसके निकट उपलब्ध रहती है। यहाँ भी अधिकांश उल्लंघनकर्त्ता या तो दबंग हैं या संपन्न-कोई रोकेगा तो पहले धुड़की देंगे, इसके-उसके साथ अपने संबंधों की। नहीं माना तो जुरमाना भर देंगे-आधा ले लो, चालान की रसीद नहीं चाहिए... नहीं सेट हुआ तो ठीक है, काटो चालान...समझेंगे शराब में उड़ा दी। रम-विस्की-बीयर की बोतलें जो फेंकते हैं।' पड़ोसी कहे जा रहा था।

मैंने कहा - वैसे भी कचरा ढोने वाले का बीच-बीच में इलाज करना जरूरी है। नहीं तो कचरा कौन ढोएगा?  यदि मरणासन्न का श्रृंगार सरकारी खर्चे पर हो रहा है, तो इसमें बुरा ही क्या है? इसी बहाने कुछ न कुछ कार्यक्रम होने लगेंगे। नदी को सम्मोहित करके, पंडालों की चादर उढ़ाकर, हवा में ऊपर उठाया जाएगा। 

तमाशे पर तमाशे किए जायेंगे।' पड़ोसी ने प्रश्न किया – ऐसा करने पर जो कचरा फैलेगा उस पर जुरमाना ठोक दिया जाएगा।। मैंने कहा - ‘सो तो ठीक है भाई... तुमने पढ़ा नहीं, चेतावनी बोर्ड के बगल में ही बाईपास खिड़की का प्रावधान... चाहे विस्की, बीयर की बोतलें नदी में फेंको या सांस्कृतिक कलाओं का, क्या फर्क पड़ता है।?' दोनों ठहाके मारकर हँसने लगे। 

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’, मो. नं. 73 8657 8657