मैं किसान हूँ न..

सूखी फसल की मार देखता।

कभी बेमौसम मूसलाधार बरसात  देखता हूँ।

लहलहाती फसलें सुकून देखता।

तत्क्षण खत्म होती फसल, का रुदन भोगता हूं।

फिर भी उफ्फ न करता ,

मैं किसान हूँ न! सारा दर्द सहता हूँ।।

कड़ी धूप खेतों में मेहनत,

खून-पसीना एक  करता।

फसल खाद पानी की चिंताएं,

मानसून आने की दुवाएं करता।

हर मौसम की  मार झेलकर

फसल उत्पादन करता हूं,

आंधी  तूफानों से बचाकर

भारत का पेट भरता हूं ।

असहाय जिंदगी, सारा मर्ज सहता हूं।

मैं किसान हूँ न! सारा दर्द सहता हूँ।।

बीज, खाद, कपड़े, बच्चों की पढ़ाई,

कभी रुपयों-पैसे की ऋण में डूब जाता हूं।

ऋण चुकाते गुजरते जीवन,

साहूकारों के बीच लूट जाता हूं।

अभावों में भी सारा कर्ज सहता हूँ।

मैं किसान हूँ न! सारा दर्द सहता हूँ।।

कभी सो जाता गहरी नींद में,

जिम्मेदारियां भूल जाता हूँ।

कभी बढ़ती असहनीय पीड़ा से

फांसी में झूल जाता हूँ।।

यही मेरी व्यथा है, यही मेरी कथा है।

अपनी दुखद दास्तान को कहता हूँ।

मैं किसान हूँ न! सारा दर्द सहता हूँ।।


देवप्रसाद पात्रे

मुंगेली, छत्तीसगढ़

मो. न. 9300085203