मानवता से भरी राह इख्तियार कर तू

धृष्टता की  ओर अपने  बढ़ते  कदमों पर ,

छल  कुटिलता से  भरे हुए  कारनामों पर ,

रोक  लगा कर यथार्थता  स्वीकार कर तू

सात्विकता  भरे  मानव  से  हार  मान तू !

मानवता  से भरी  राह  इख्तियार  कर तू !


जगत  के  अदभुत  सुंदर  नाट्यशाला  पर ,

असहाय  दीन  दरिद्र निर्धन  के जीवन पर ,

नीच पतित अछूत दानव बनकर न उभर तू

आपदाओं  की जड़  नहीं  समाधान बन तू !

मानवता  से  भरी  राह  इख्तियार  कर  तू !


सितारों  से  झिलमिलाते  अनन्त अंबर पर ,

अपनी  दोनों  बाजूओं की काबिलियत पर ,

नभचर  बाज की तरह ऊंची  उड़ान भर तू

बेवजह  भलेमानुस  को  चोट न  पहुंचा तू !

मानवता  से भरी  राह  इख्तियार  कर  तू  !

             

                  ✍️ ज्योति नव्या श्री

                   रामगढ़ , झारखण्ड