ग़ज़ल : ये ज़िंदगी हँसा के रुलाए तो क्या करूँ

मुझपे सुरूर हुस्न का छाए तो क्या करूँ

फिर मयकदा शराब भुलाए तो क्या करूँ


पल-पल हर एक रात जगाए तो क्या करूँ

गर याद तेरी मुझको सताए तो क्या करूँ


आगाह ज़िंदगी से हूँ वाक़िफ़ भी हूँ मगर

निस-दिन नया सबक ये सिखाये तो क्या करूँ


अब ज़िंदगी को जीना पड़ेगा ज़रूर से

गर मौत भी मुझे ही न आए तो क्या करूँ


मेरी ही हसरतों का जनाज़ा निकालकर

मुझको नहीं वो साथ बुलाए तो क्या करूँ


रोऊँ या छोड़ कर ही चला जाऊँ ये बदन

ये ज़िंदगी हँसा के रुलाए तो क्या करूँ


प्रज्ञा देवले✍️