सहज-असहज

सहज व असहज के बीच

जीवन वृत सा होता हैं।

परिधि में जिसकी

सुख दुःख होता हैं।

सहसा परिवर्तित होता हैं।

जैसे पहियाँ घूमता हैं।

सोच समझ से दूर

कल्पनाओं के आकाश

के पार होता हैं।

अपनी गति से चलता समय

जैसे राह हो जीवन की

अचानक मोड़ लेकर

बदलता सुख दुःख जीवन के।

दर्द की रेखाओं से

बिंदुओं को मिलाता हैं

जोड़ बाकी कर जीवन में

सब कुछ बदल देता हैं।

गणित सारे जीवन की

अंत में शून्य हो जाती हैं।

शून्य में बदलकर

शून्य के पार चली जाती हैं।


गरिमा राकेश गौतम

कोटा राजस्थान