सृजन का नशा निराला है

हो सृजन कोई भी चाहे,

मन बड़ा मतवाला है।

देखो उस सृजन ने हमको,

दीवाना कर डाला है।


खाना हम बनाते हैं ,

भांति भांति के व्यंजन पकाते ।

 प्यार की  हो मिठास उसमें ,

खाना स्वादिष्ट हो जाता है।


खाना स्वादिष्ट प्यार से बनता,

स्वाद उसका तभी है बढ़ता।

घरवालों को अच्छा लगता,

सृजन का नशा निराला है।


सृजन करूं मैं कभी रचना का

प्रकृति प्रेम ,सिंगार लिखूं,

हास्य ,वियोग देशभक्ति लिख दूं

ममता मई में बातें कह दूँ।


विचार उमड घूमड कर आते

रातों को में सो ना पाती

भावों की श्रृंखला से देखो

खुद को  जुड़ा हुआ पाती।


भावों को शब्दों में डालती 

शब्दों की में माला गूंथती।

वाहवाही सबकी हम चाहें,

सृजन का नशा निराला है।


हर समय विचार कहांँ आते ,

कभी-कभी वह रुक जाते।

बिना लिखे फिर चैन ना आए,

लिख लूं तो मन चैन पा जाए।


सृजन का नशा निराला ,

मधु ने यह कह डाला ।

सभी सृजन कारो का हाल,

मैंने तुमको कह डाला।।


         रचनाकार ✍️

         मधु अरोरा