सिपाही

वतन में महफ़िले सजी हमारे सीने गोलियाँ

लहू बिछा था हर तरफ थी लाशों की ही बोरियाँ


हवा थी चल रही गजब न आँधियों का दौर था

चला रही थी गोलियाँ वो दुश्मनों की टोलियाँ


तबाह इस कदर हुआ हर एक छोड़ कर चला

गुबार में खड़ा रहा गुज़र रहा था कारवाँ


नहीं गया वो घर कभी नहीं मिली वो गोद फिर

हुआ जहाँ शहीद वो कफ़न उसे मिला वहाँ


मैं आम सा सिपाही था ज़मीन-दोज़ हो गया

जो छू रहा था आसमां उसी पे ये मिटा जहाँ


ज़रूर वज्ह था कहीं वतन की मैं सुरक्षा का

सुनी नहीं ज़माने ने यूँ फिर भी मेरी दास्ताँ


मुझे कोई गिला नहीं मिला कोई सिला नहीं

फ़क़त सुकून इतना है वतन का हूँ मैं पासबाँ


प्रज्ञा देवले✍️