दारू की उत्पत्ति

चलो आओ तुम्हें मैं बात बताती,

कैसे हुई दारू की उत्पत्ति 

मैं तुमको देखो सब बतलाती

बैठे थे हम महफिल में भाई की

भाई ने जो बात बताई 

उसको अपने ढंग से समझाती 

बात पुरानी देखो शांत सा वातावरण था,

सद्भाव से भरा हुआ मानव था।

दिखता कोई ना तंग, सब थे सदाचारी,

आई खुराफात किसी के मन में,

चलो आओ कुछ ऐसा कर दे।

जिससे थोड़ा झूमे आदमी

 वही हम काम कर दे ।

मिल कर देखो चार यार ने

 मंत्रणा यह कर डाली,

ली हांडी एक पानी की

 अंगूरों से भर डाली।

थोड़ा-थोड़ा अंगूर पके 

चख देखें चारों यार,

स्वाद उनको लगा कम

 कोयल एक पका डाली

पी कर देखा थोड़ा ठीक लगा 

दूजा बोला तोता  डालो।

स्वाद थोड़ा और जमा 

थोड़ा दिमाग और चला,

जा रहा था एक भेड़िया

 वह भी उस में है डाला।

चारों ने पी कर देखा

 टेस्ट बड़ा मतवाला सा,

शेर अचानक एक था आया 

शेर मार कर उसमें डाला।

सरूर हुआ बड़ा मतवाला,

देखो दिमाग चलने लगा।

सूअर एक फिर वहाँ मिला,

उसको भी पका डाला।

पीकर हाल हुआ मतवाला

चारों थे झूमने लगे।

देख लो यारों सुन लो यारों

पीते जब पहला जाम

कोयल सी वह बातें करते।

दूजे में तोते से बोले

चुप ना हो बार-बार एक बात ही बोले।

तीजे में देखो क्या बात हुई

तेज दिमाग अति चले।

चौथी में तो शेर लगे

 जाने क्या गरज ही बरस कर बोले।

 बातें अपनी-अपनी ही बोले

 शेर जैसे काम कितने कर दूं।

  ज्यादा जो उसने पी ली

 सूअर बना जमीन पर लौटे।

 पता नहीं है उत्पत्ति सही क्या

 दारु पीने वाला का हाल यही लगे।

 गलती हो तो क्षमा करें

 सही मार्गदर्शन हमारा करें।

             रचनाकार ✍️

             मधु अरोरा