मौत

ज़िंदगी खुद दबी है मौत के एहसान में,

फिर क्यों जीता है बन्दे तू अभिमान में?

मृगतृष्णा में फँसकर भूल बैठा जीवन,

तू बस अपनी ही पहचान में।


जगा अंतरात्मा को अपनी,

परहित में लगा जिंदगानी,

ताकि जब भी मिले मौत,

तेरा शरीर न करे तुझ पे शोक।


ज़िंदा हैं बस वो इंसान जो जागृत है,

जीवन का हर पल जिसके लिये अमृत है,

सिर्फ मरना ही मौत का नाम नहीं,

अकर्मठ का जीवन भी मृत्यु तुल्य है।


ज़िंदगी है हर पल मौत के साये में,

मत ढूंढ तू इसे अपने पराये में।

पहचान खुद के वजूद को,

मत रह क्या कमाया क्या गँवाये में?


आना है मौत ये अटल सच्चाई है,

दुनिया याद जिसे रखे वही असली कमाई है,

पाल पोष कर पाप की गठरी जो तू जायेगा,

मृत्युपरांत भी न किसी को याद न रह पायेगा।


                 रीमा सिन्हा (लखनऊ)