..और "कविता" लिख दी !!

भटकता रहा "जन्मों जनम" कि ठहरने की नीयत न थी ,

सुनों, सफ़र ही है जिंदगी रास्तों से अजनबीयत कैसी !!


क्या कहूं, ये सब मेरे ही "करम" हैं या वक्त की दी सजा ,

"खुदा" मैं हो न सका और इंसानों की सी हैसियत न थी !!


तुमने बड़े ही शौक से उगा लिए हैं यहां कंक्रीटों के शहर ,

क्या ही कहें, क्या "बारिशों" में भीगने की तबीयत न थी !!


न दोष दो उमस को, धूप को, न‌ ही कड़ी दुपहरियो को ,

ज़रा संभलो, एक पौध तो लगाओ यहां इंसानियत की !!


"मनसी", जरूरत थी जहां भी दूर तलक रूहानी इश्क की ,

वहां-वहां रख दिया नाम "तेरा" और "कविता" लिख दी !!


नमिता गुप्ता "मनसी"

मेरठ, उत्तर प्रदेश