चंचल मन के चितवन

अभी कुछ पल बाकी है

जी लेने दो मुझकों।

कितने सुख- दुःख के टुकड़े

पसरे है मेरी झोली में।

रंग बिंरगे फूल खिले है

मेरे आँगन के बगीचे में ।

खेल रही है आँख मिचौली

सावन की ये काली बदरी।

कितने  हर सृंगार झरे है

कितनी महक रही चमेली।

बूंदाबांदी शुरू हो गई

इसे पिरो कर हार बना लूँ

या सहेज लूँ आँखों में।

बांध घुँघरू पाँवों में

छम - छम कर नाचूँ आँगन में।

बस इतनी ही तो ख्वाहिश है

करने दो अबकी सावन में।

हाँ अभी कुछ पल बाकी है

जी लेने दो चंचल मन के चितवन में।


-- लवली आनंद

मुजफ्फरपुर , बिहार