प्रमाण तो कुछ नहीं था नादानियों का मेरी

प्रमाण तो कुछ नहीं था 

नादानियों का मेरी 

प्रेम करना ही जैसे 

जीवन की सबसे बड़ी

गलतियाँ थीं... मेरी 


वो क्षितिज के पार 

चाँद और चाँदनी की 

रोशनी में नहाते हुए 

तुझे याद करना ही 

बेबसी थी .....मेरी 


फूल और तितलियों 

की तरह जीवन का रंग 

पास होकर भी न छू 

पाने का अजीब दंश 

क्या जिंदगी थी... मेरी 


महक तो जाती मैं भी 

खुशबूओं के साये में 

खिल तो जाती मैं भी 

किरणों की तरह ढल 

जाना ही नियति थी.... मेरी


वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़