जाने क्यों बौछारें आयी

विस्मृति की चादर तान सोयी थी,

सत्य को झुठलाकर खोयी थी,

चिर वेदना जगाने फुहारे आयीं,

जाने क्यों सावन की बौछारें आयी?


उषा ने फैलाया निज लोहित वर्ण,

मेघों ने बरसाया मृदु मधु-कण,

नित नव लतिका को तड़पाने,

जाने क्यों दामिनी की अंगारे आयीं?


नव पल्लव में आवृत्त मृदु गात,

नहीं झेलना मधुप का आघात,

झरे सुमन,झरे मधु प्रात में फिर,

जाने क्यों गुन-गुन की बहारें आयी?


बूँदों ने खींची आज स्मित रेखाएँ,

है यह भी लघु क्षण किसे बाताएँ?

निर्झरणी इन दृगों को हर्षाने,

जाने क्यों प्रीत फिर द्वारे आयी?


            रीमा सिन्हा (लखनऊ)