गाती गुनगुनाती नदियां

सरर सरर घनघोर,

मत करे तू ज्यादा शोर,

रातभर बहते जब हो जाती हैं भोर,

धीरे बहने में क्योंकर आता है जोर,

तू नदियां बहना है रे तेरा काम,

चारों धाम है तेरा बसेरा,

कहीं धीमे धीमे, चंचल चंचल,

पहाड़ों में जाकर क्यों बन जाती तू काल !

तू नदियां गाती गुनगुनाती रहियो,

इससे ज्यादा मैं कुछ ना कहियो,

आपे में ही रखना अपने आप को,

वरना लग न जाये तुझको कोई श्राप !

तेरा तट सुंदर-सुंदर, सुंदर तेरा मुखमंडल है,

मानव-पशु पीते निर्मल जल, साथ ही सुंदर

वनमंडल हैं, बस ऐसे ही तू गुनगुनाती रहना,

नदियां तुझसे बस इतना ही कहना !

तू नदियां बहना है रे तेरा काम रे !

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- मदन वर्मा " माणिक "

इंदौर, मध्यप्रदेश