सुहानी बरखा

हृदय आल्हादित हो जाता है, यह मन मयूर हर्षाता है

घनघोर घटाएं सावन की,जब रिमझिम रिमझिम बरसत है

झूम झूमकर चले पुरवाई ,तरुओं पर छाई तरुणाई

नवपल्लव विकसित होकर, झूम झूम कर पल्लसत है

बरखा में कोयल की कुहू प्यारी,पिहू पपीहे की न्यारी

कर्णप्रिय मधुर कलरव, सुनकर सबका मनवा हरषत है

चम चम चमकत चंचल चपला,घन घन गरजत कारे बदरा,

आए गीली मिट्टी से सोंधी खुशबू,जब जब वसुंधरा भीजत है

धरा ने ओढ़े हरित वसन, वल्लरी से लिपटे कुसुम कानन

चहुंओर व्याप्त सुगंधित बयार, गोरियों का मन भी महकत है

नील गगन धवल हो गया, झुकें मेघों से श्यामल हो गया

नयनाभिराम अलौकिक सौंदर्य, नयनों से प्रतिक्षण निहारत है

ताल तलैया नदियां और नालें,जलपूरित हुए आज ये सारें

यह धरती अथवा सागर है, ये देख नजारें सब भूलत हैं

इन्द्रधनुष की सतरंगी चादर, अनुपम छटा दिखाती है

नव तान वितान नूतन परिवर्तन, व्योम को जब निहारत है

स्वरचित एवं मौलिक

अलका शर्मा, शामली, उत्तर प्रदेश