ग़ज़ल : जान सस्ती है

बनाता है बशर घर को दिवारों से मुहब्बत की

मगर ऐसे मकानों पर रक़ीबों की नज़र क्यों है


न घबरा तू बशर अन्याय की ठोकर से दुनिया की 

जहाँ इंसाफ करता ग़र खुदा का फिर वो दर क्यों है


मुझे इतना बता मेरे खुदा मेरा सफर क्यों है

अगर अंजाम मरना है तो ज़िंदा सा बसर क्यों है


यहाँ कानून मँहगा है हमारी जान है सस्ती 

कभी मिलता नहीं इंसाफ़ ऐसा काल पर क्यों है


जहां अपराध पलता है पुलिस भी तो वहाँ होती

सरेबाजार क़त्लेआम हो जायेंगे डर क्यों है


समंदर सी ज़फ़ा होती वहाँ राते नहीं सोती

ये कैसी ज़िंदगी है ज़िंदगी ऐसी मगर क्यों है 


प्रज्ञा देवले✍️