मोहब्बत

बड़ी कश्म कश हैं 

दिल की ये किसी पे 

ऐतबार नही करता

सहता भी नही किसी 

ज़ालिम की खुलकर 

वार भी नही करता।

ठहर गया किसी के दर पे

इंतज़ार तो बहुत है 

पर दरकार नही करता।

मोहब्ब्त हैं भी तो ऐसी

की भीड़ है लाखों पर

आँखों से उसको टस से 

मस नही करता।

है रेत गर उम्मीदें मोहब्ब्त,

वो फ़ना हो दरिया 

भी नही करता।

एक रोज़ उसके शहर में 

जाएंगे ढूंढेगे चुपचाप उसे,

की मोहब्बत हो गहरी 

तो कोई रुसवा 

भी नही करता।


डिम्पल राकेश तिवारी

अयोध्या,उत्तर प्रदेश