वाया सरकारी अस्पताल...

कई घंटे बीत गए थे। डिस्पेंसरी में लगी लाइन में मेरा नंबर क्या था, यह ठीक से नहीं बता सकता। कोई न कोई आकर बीच में बैठ जाता। इसलिए गिनना ही छोड़ दिया। एक मरीज आगे वाले को कोहनी करते बुदबुदाया– कितना समय और लगेगा। उसे कोई जवाब न मिला। मन तो किया जम कर फटकार लगा दे– आख़िर हमें इतना इंतज़ार क्यों कराया जा रहा है? हम यहाँ न तो पार्टी के टिकट के लिए खड़े हैं न राशन की दुकान पर, फिर देर क्यों? तभी उसे याद आया वह मरीज है। उसे मरीजों की मर्यादा का पालन करना चाहिए और चुप रहना चाहिए। घर वालों के बार-बार समझाने पर भी चिलमिलाती धूप में धरना देने गया था। आज धरना देना बहरों के कानों में डीजे बजाने के बराबर है।  मरीज और विपक्ष दोनों समय के मारे होते हैं। जब तक योग न हो तब तक दोनों को चुपचाप रहना चाहिए। लेकिन हैं तो दोनों समय के मारे। बिना चूँ-चाँ किए कैसे रह सकते हैं। इसीलिए बीच-बीच में जिंदा रहने के लिए कराहते रहते हैं।

दूसरा मरीज पहले मरीज के कराहने से थोड़ा कसमसाया। फिर बोला शटअप। वार्ड ब्वाय लड़की से चिट-चैट करते हुए भी हमारा कितना ध्यान रख रहा है। शुक्र मनाइए कि वह ईमानदार है, नहीं तो हमारा नंबर यहाँ तक भी नहीं पहुँच पाता। हम अकेले ही नहीं बाकी के मरीज भी कितने परेशान हैं। ट्राई टू अंडरस्टैंड। पहले वाला अब खुल कर बोल सकता था क्योंकि मर्यादा का उल्लंघन दूसरी ओर से हुआ था। बोला, "तुझे हुआ क्या?”

"घर जल्दी आकर समाचार देखने का यह हाल है।" दूसरे ने आ-ऊँ करते हुए कहा। 

तब तक तीसरा बोल पड़ा, "समाचार चैनल? कम से कम तुम कुछ देखकर बीमार पड़े हो। मैं तो बिना कुछ देखे इसकी उसकी बातों में आकर बीमार हुआ हूँ।"

पहला, "वो कैसे?”

तीसरा पसलियों के दर्द से कराहते हुए, "किसी ने कहा वहाँ खुदाई चल रही है। किसी ने कहा वहाँ भगवान निकले हैं। इनकी-उनकी बातों में आकर भगवान देखने निकला तो वहाँ पहले से जमा भीड़ ने खुंदल-खुंदलकर मेरी खुदाई कर दी।”

तभी उनमें से एक की नजर मुझ पर पड़ी। मेरा हाल-चाल पूछ लिया। मैंने कहा, मैं सरकारी अस्पताल गया था। वहाँ डॉक्टर साब ने  न जाने कौन सा इंजेक्शन दिया कि हाथ-पैर सूज गए। बहुत चिरौरी की तब उन्होंने यहाँ आने की सलाह दी और कहा, सरकारी अस्पताल में भीड़ बहुत होती है। सभी का इलाज ठीक से नहीं हो पाता। तुम मेरे प्राइवेट डिस्पेंसरी पर आना वहाँ तुम्हारा इलाज ठीक से कर दूँगा।

मेरा इतने कहना भर था कि सभी मुस्कुराने लगे। मैं उनकी हँसी समझ न सका। कारण पूछने पर पता चला कि यहाँ जितने भी आते हैं वे वाया सरकारी अस्पताल होते हुए ही आते हैं। हम सभी मरीज हमाम में नंगे थे। निजी डिस्पेंसरी में सरकारी मरीजों को देखकर मेरी हालत मुरझाई हुई तरकारी की तरह हो गई।  

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’, मो. नं. 73 8657 8657