एक व्यंग्यकार का एफ.आई.आर.

एक व्यंग्यकार दूसरे व्यंग्यकार के खिलाफ थाने में एफ.आई.आर. लिखाने आया। इंस्पेक्टर के पूछने पर उसने बताया - "साहब, बदमाश व्यंग्यकार नहीं उचक्का है, उचक्का। उसने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा। हम दोनों में तय हुआ था कि दोनों बारी-बारी से एक-दूसरे को एक-एक घंटा सुनाएँगे। पहले कौन सुनाए इस पर हमने सिक्का उछाला। पर मेरा दुर्भाग्य कि पहला नंबर उसका आ गया। बदमाश ने एक घंटे में दो घंटे का मैटर सुनाकर फोन काट दिया। कहने लगा कि सिग्नल प्रोब्लम है। अब वह मेरी सुनने को तैयार ही नहीं है। उस दिन से मैं फोन लगा रहा हूँ। वह उठाने के बजाय मेरा कॉल काटता जा रहा है। गुस्सा तो मुझे बहुत आ रहा है। उसने व्यंग्य के नाम पर एक से एक घटिया रचनाएँ सुनाकर मेरे कान से खून निकाल दिया। वह तो मैं हूँ जो हर दिन पौष्टिक भोजन लेता हूँ। कोई और होता तो कलेजा निकल आता। मूर्छित हो जाता। अस्पताल ले जाते-ले जाते वह बंदा मर जाता।

मैंने प्रण लिया है कि जब तक अपनी व्यंग्य रचनाएँ उसे सुना नहीं लेता तब तक मैं चैन की सांस नहीं लूँगा। लेकिन करूँ भी तो क्या करूँ,  मैं तो लुट गया। मुझे बचाइए। बदमाश को कहीं से भी ढूँढ़कर लाइए। मैं अनशन पर हूँ। जब तक उसे अपने व्यंग्य सुना नहीं लेता तब तक अन्न-जल को हाथ नहीं लगाऊँगा। फोन की गैलरी में रचनाएँ भरकर घूम रहा हूँ। कसम से एक बार मिल जाए तो सारी की सारी रचनाएँ उस पर दाग दूँ। इंस्पेक्टर साहब मैं आपके हाथ जोड़ता हूँ। पैर पड़ता हूँ। कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हूँ। बस एक बार उसे पकड़कर ले आइए। कीमत का नाम सुनते ही इंस्पेक्टर का रिश्वती जमीर जाग गया। उसने कहा  "उठो भैया! धैर्य से काम लो इस संकट की घड़ी में भगवान् का नाम लो। नहीं तो मेरा नाम लो। अभी तो मैं ही तुम्हारा भगवान हूँ। मैं तुम्हारी पीड़ा समझ सकता हूँ। मित्र का छल-कपट अनुभव कर सकता हूँ। मैं उसे हरगिज नहीं छोड़ूँगा। बस हमारी ‘कीमत’ चुका दीजिए।

कीमत का नाम सुनते ही व्यंग्यकार असमंजस में फंस गया। कहा – यदि मैं कीमत चुकाने की हैसियत रखता, तो व्यंग्यकार हरगिज नहीं बनता। इसलिए मेरी मजबूरी को समझिए। मेरी सहायता कीजिए। इंस्पेक्टर ने कहा, मैं तुमसे रुपया-पैसा नहीं मांग रहा हूँ। बस बदले में मेरी रचनाएँ सुननी है। इतना कहता हुए इंस्पेक्टर ने अपने एक साथी पुलिसकर्मी को बुलाया। वह दौड़े-दौड़े दो डायरी ले आया। यह देख व्यंग्यकार ने  कहा, ये दो-दो डायरी क्यों। इस पर इंस्पेक्टर ने कहा कि एक डायरी मेरी है जिसमें वर्ष के 365 दिन की 365 रचनाएँ हैं। ठीक उतनी ही साथी पुलिसकर्मी की हैं। वह पहले पहल अपनी रचनाएँ सुनाकर माहौल बनाएगा। उसके बाद मैं आकर अपनी रचनाएँ सुनाऊँगा। तब तक आपके दुश्मन व्यंग्यकार को ढूँढ़ लाता हूँ। मैं अपने काम के प्रति बड़ा ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ हूँ। आपसे भी यही उम्मीद रखता हूँ। यदि थोड़ी सी भी चालाकी या फिर भागने की कोशिश की, तो तुम्हारा हश्र भी उधर जेल में बंद पड़े व्यंग्यकारों की तरह होगा।  इन सभी कैदी व्यंग्यकारों ने मेरी रचनाएँ सुनने से मना कर दिया या बीच में ही सो गए। इसलिए उनका यह हश्र हो रहा है। आशा करता हूँ कि आप मेरी बात समझ गए होंगे। अच्छा तो मैं चलता हूँ और आपके शत्रु को पकड़ लाता हूँ। 

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’, मो. नं. 73 8657 8657