प्रेरणा

“सर आपको आवाज आई?”

"नहीं तो.."

"अरे सर इतना तेज तो चिल्ला कर गए वो। क्या बोलकर गए? नहीं सुना?”

"नहीं, मैंने कुछ नहीं सुना, क्या हुआ?"

"नहीं, कुछ नहीं सर, मैं रखती हूं फोन"

फोन रखने के बाद भी मास्टर प्रकाश के दिमाग में ये बात घूमती रही। क्या हुआ प्रेरणा के साथ? कौन क्या कहकर गया? फोन क्यों काट दिया? 

प्रेरणा बड़ी समझदार लड़की थी। पढ़ाई में तेज़ और अनुशासन में अव्वल। मास्टर प्रकाश को वो अपनी बेटी सी लगती थी। दो महीने पहले ही उसका बारहवीं का नतीजा आया था और प्रेरणा के कक्षा में सर्वाधिक अंक आए थे। मास्टर प्रकाश उसे हर मामले में गाइड करते रहते थे और पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे। प्रेरणा के पिता लापरवाह व्यक्ति थे और शराब के नशे में धुत रहकर पारिवारिक जिम्मेदारियों से भागते थे और नहीं चाहते थे कि प्रेरणा आगे पढ़ाई करे। प्रेरणा के घर का माहौल भी बहुत रूढ़िवादी था। 

मास्टर प्रकाश को प्रेरणा अपने पिता जैसा मानती थी और अपने दिल की हर बात साझा करती थी। कॉलेज में एडमिशन की बारी आई तो प्रेरणा के पिता ने विरोध किया लेकिन प्रेरणा ने जिद पकड़ ली कि मैं पढ़ना चाहती हूं। काफी विवाद और कहासुनी के बाद प्रेरणा को इस शर्त पर इजाजत मिली कि वो सहेली के साथ ही कॉलेज जायेगी लेकिन सहेली के घर नहीं जायेगी। प्रेरणा पाबंदियों से घिरी हुई थी। न कहीं आना, न जाना, न मनपसंद कपड़े  पहनने की छूट। 

कॉलेज जाने के कारण प्रेरणा को एक पुराने जमाने वाला फोन दिया गया और वो भी सिर्फ कॉल करने की मंजूरी के साथ। इसी फोन से प्रेरणा कभी–कभी मास्टर प्रकाश से बात करके कुछ मार्गदर्शन ले लेती थी। प्रेरणा की सहेली बहुत कम कॉलेज जाती थी और प्रेरणा को अकेले जाना पड़ता था। 

घर से कॉलेज के रास्ते में काफी इलाका सुनसान पड़ता था। प्रेरणा मास्टर प्रकाश को फोन कर ये पूछ रही थी कि बी.ए. में विषय बदलने चाहिए या वही बारहवीं वाले पढ़ने चाहिए। एक मोटर साइकिल की आवाज आई और उसके बाद प्रेरणा ने फोन काट दिया। मास्टर प्रकाश को चिंता हो रही थी कि कुछ तो हुआ है। 

अगले दिन प्रेरणा ने कॉलेज से लौटते हुए मास्टर प्रकाश को फोन किया तो प्रकाश ने पूछ लिया कि क्या हुआ था कल?

प्रेरणा बोली– सर कोई बड़ी बात नहीं। ये तो रोज़ का है। आते–जाते मोटरसाइकिल सवार लड़के कमेंट कर जाते हैं। गाड़ी पास लाकर होर्न मार जाते हैं या फिर सीटी। अगर सड़क के किनारे–किनारे न चलूं तो मोटरसाइकिल सवार लड़के छूने की कोशिश करते हैं। अगर कुछ हरकत न भी करें तो पीछे मुड़कर घूरते हुए जाते हैं। स्कूल तो गांव में ही था तो सहूलियत थी। कॉलेज दूर है और रास्ता थोड़ा सुनसान है तो परेशानी होती है। 

मास्टर प्रकाश ने ये सब सुना तो अवाक रह गया। मास्टर प्रकाश शहर में रहते थे और कस्बाई अनुशासनहीन माहौल की ज्यादा जानकारी नहीं थी। शहरों में अधिकाशं महिलाओं को उनके अधिकार मिल जाते हैं और छेड़छाड़ की घटनाएं भी कम होती हैं। साहित्य के पाठों और कविताओं को पढ़ाते वक्त उसने नारी सम्मान पर बड़े बड़े लेक्चरस दिए थे। आज उसकी ही छात्रा के आत्मसम्मान की कोई रक्षा नहीं हो पा रही थी और उसे महसूस हुआ कि किताबी ज्ञान, भाषण, धर्म, परंपराएं सब चीजें खोखली हैं और सड़ा हुआ समाज सिर्फ अपने ऊपर नैतिकता का मुखौटा लगाए हुए है। मास्टर प्रकाश को कुछ नहीं सूझा कि वो प्रेरणा की कैसे मदद करे? 

उसने पराजित भाव से कहा– प्रेरणा अपने पिता को बताया ये सब? वो तुम्हें कॉलेज छोड़ आया करेंगे।

प्रेरणा टूटे हुए स्वर में बोली– सर, पापा मेरी पढ़ाई छुड़वा देंगे। मैं पढ़–लिखकर कुछ बनना चाहती हूं। वे मुझे ही भला–बुरा कहेंगे। उन्हें मुझ पर विश्वास नहीं हैं। शायद लड़की होने के ये सब दंश हैं और ये सब कष्ट झेलने ही पड़ते हैं। अच्छा सर, घर आने वाला है, मैं रखती हूं फोन। 

मास्टर प्रकाश ने आज बहुत असहाय महसूस किया। मास्टर प्रकाश को लग रहा था कि प्रेरणा किस अपराध की सजा भोग रही है? आते जाते छिछोरों की बुरी और अभद्र टिप्पणी उसे कितना आहत कर जाती होगी।

उसकी चेतना टुकड़े–टुकड़े हो जाती होगी। उसका गर्व, डर और असुरक्षा की चोट से जख्मी हो जाता होगा। वो अपनी पीड़ा किसी से कह भी नहीं पाती। स्त्री होना इतना बड़ा अभिशाप है कि स्त्रीत्व दुर्गन्ध से भरे समाज को भी झेलता है और परंपरावादी परिवार के क्रोध को भी। मास्टर प्रकाश आत्मग्लानि से भरे विचारों में ही खोया हुआ था कि उसके बेटे की आवाज आई।

“पापा मैं दोस्तों के साथ बाहर जा रहा हूं।”

”सुनो पवन। शाम को सारे दोस्तों को घर लेकर आना। मुझे सबसे बात करनी है।”

मास्टर प्रकाश ने सोच लिया था कि समाज को सुधारने की शुरूआत करनी ही होगी। हम सभी को और अपने घर से ही। बेटे और उसके दोस्तों को किसी लड़की की भावना और सम्मान के बारे में समझा सकूं, लड़कों की मानसिकता बदलने की एक कोशिश तो की ही जा सकती है ताकि कोई प्रेरणा सड़क पर अकेले चलते हुए स्वयं को भयभीत और आहत न महसूस कर सके।

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अवतार सिंह, प्राध्यापक

जयपुर, फोन 8209040729