ग़ज़ल :दिल को उल्फ़त के काम ने मारा


मुझको इस इश्क़ नाम ने मारा

दिल को उल्फ़त के काम ने मारा


यूँ तो हारे नहीं थे गम से कभी

इक मुहब्बत की शाम ने मारा


बेवफा हो निकल गए थे कभी

आज उनके सलाम ने मारा


मौत की क्या मजाल क़त्ल करे

जब शराबी को जाम ने मारा


जिसको तलवार भी मिटा न सकी

उसको मेरे कलाम ने मारा


मुफ़लिसों को अमीर ने ही नहीं

वस्तु के बढ़ते दाम ने मारा


चाहे मंज़िल की होड़ हो सबको

मुझको ऊँचे मुक़ाम ने मारा


कोशिशें तो हजार की सबने

कंस को सिर्फ श्याम ने मारा


जब मरा ही नहीं किसी बल से

छल से रावण को राम ने मारा


प्रज्ञा देवले✍️