ग़ज़ल : ज़मीं को होड़ हो जिनको वो रेगिस्तान लेते हैं

इनायत उस खुदा की है कि हम पहचान लेते है,

कहाँ गद्दार बसते है वो मिट्टी जान लेते है ।


लहू बहता जहाँ हर ज़िंदगी का सर कलम होता,

जनावर वो बशर होता जो निश्छल जान लेते है।


अज़ल तलवार रखते है रक़ीबों से बचाने हम  ,

नहीं चुनते कोई पत्थर हीरो की ख़ान लेते है ।


खुदा के दिल में भारत है ज़मीं की शान है इंसां

अगर दुश्मन उठा ले आँख तोपें तान लेते है ।


वो हिंदुस्तान में रहता जिन्हें दिल से मुहब्बत हो,

ज़मीं की होड़ हो जिनको वो रेगिस्तान लेते हैं ।


हमी यूँ खो गये इतना मुहब्बत यादों में तेरी,

मुहब्बत को ही हम अपना पता अब मान लेते है ।


प्रज्ञा देवले✍