खुद के अधिकार के लिए

नारी के लिए...

समर्पण ही क्यों बना है?

खुद के अधिकार की बात करे तो

समाज कहता उसे बहुत बुरा है।

जनता के लिए...

अधिकार बस किताबी पन्नों पर,

नेतागण ही कर लेते हनन सब।

आम आदमी की कीमत कुछ भी नहीं,

कहलाने को लोकतंत्र पर,

निर्धन का यहाँ कोई मोल नहीं।

वक़्त का पहिया घूम रहा है,

कुछ भी न सदा के लिए ठहरा है।

वक़्त है अब जाग जाने का,

अधिकारों की खातिर आवाज़ उठाने का,

शोषण जहाँ होता है,भ्रष्टाचार जन्म लेता है।

निज अधिकारों को कृपाण बनाकर,

निकल पड़ो तुम दुर्गम पथ पर,

रणभेरी अब बज चुकी है,

श्रवण शक्ति क्यों कमज़ोर पड़ी है?

अपने अधिकारों का हनन मत होने दो,

धरती पर पग धरो किंतु निज अम्बर न खोने दो।

               रीमा सिन्हा

        लखनऊ-उत्तर प्रदेश