रजनी

ले रजनी की ओट झिलमिल अश्रु तारों वाले

लिपट चंद-चंद्रिका सिहर उठे मन मतवाले


घूम रही प्यासी हिरनी मानो मरुथल की रानी 

सजल नयन बादल को देखो पानी ही पानी


सोंच रही खोलूँ गिरहें गाऊँ गिन-गिन गीतों को

शेष रहा जो जीवन चुन लूँ पल छिन मीतों को


समझा मैंने अब तक जो वो मैं समझाती हूँ 

जीना है सबको अपने हिस्से की अपनी रजनी को


तम के चादर में लिपटी रजनी भोर लिए मुट्ठीमें

बन के चरागाँ नित फैलो पाना है विश्राम तुम्हें रजनी में। 

  

जब राह तिमिर घनेरे आकाश को सूनेपन में ढँक ले

बिखरा दो पंखुड़ियां गुलाब की इन स्याह घनेरी राखों में


मंजुला श्रीवास्तवा