देश की प्रतिष्ठा

सच!

मुझे नहीं पता

मनुष्यता क्या होती है

और राष्ट्रीयता का रंग

कैसा होता है?

स्वर्णिम अक्षरों से लिखा

माँ भारती का इतिहास

इस विकल्पहीन समय में

क्यों प्रेरणा नहीं देता?


विश्व गुरु था जो देश

गंदे ,सड़ांध भरे वातावरण में

क्यों कराह रहा है

हर तरफ छिड़ी हुई है

अपने - अपने अस्तित्व की जंग

किसी की सिसकियों से

दरक रहा है नीरव एकांत

थिरकते पैरों में 

रिसने लगा है जख्म

शतरंज - सी जिंदगी में हर कोई

बन रहा है मोहरा

कौन लिख रहा है

शस्य श्यामला भूमि पर

युद्ध की इबारत


निश्छल जीवन की

खुशियों पर

 प्रहरी बैठ गए हैं

अभिशापों के

कुछ सिरफिरे लोग

जिन्हें भटका दिया गया है

सियासतदानों की चालों  ने

जो मातृभूमि के वक्ष स्थल को

चीर चीर कर रहे हैं

हिंसा व नफरत के खंजर से

समूची मानवता को

शर्मसार कर

रोप रहे हैं नफरत के शोले

जिनसे तबाह हो रही

गंगा- जमुनी

सभ्यता,  संस्कृति

और देश की शान


कर्तव्य पथ से भटके

इन अंधेरों का हाथ थामकर

फिर से, नया दिया जलाएं

शब्दों का उत्सव मनाकर

सृजित करें फिर गीत नए

विश्वास के,  श्रद्धा के

संवेदना के, प्यार के

श्रम के, राष्ट्रीयता के

जिससे हमारे देश की प्रतिष्ठा

सदियों तक बची रहे।


● राजकुमार जैन राजन

आकोला - 312205, चित्तौड़गढ़ , (राजस्थान)

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