श्रमिक संगठन

 किसी भी संगठन को बनाना बहुत कठिन होता है..!

किसी भी संगठन को बनाना बहुत कठिन होता है, इसलिये संगठनों को सामूहिकता के साथ चलाया जाना चाहिये।संगठन सामाजिक हो श्रमिकों का हो या अन्य कोई भी हो। संगठन में ही सामूहिक शक्ति है। १।

संगठन में रहकर आगे बढ़ने के बाद जो अहम अपना लेते हैं, दूसरों को कुछ नहीं समझते, उन्हें सम्मान नहीं देते और किसी का काम करके खुद की जेब भरतें हैं, वे संगठन से स्वयं को ऊपर समझते हैं गफलत पाल लेते हैं कि संगठन हम ही चला रहे हैं संगठन के लिए नहीं, जो स्वयं के स्वार्थ और शोहरत के लिए राजनेताओं/मंत्रियों से जुड़ते हैं वे अपने ही लोगों से दूर हो जाते हैं, लोगों का विश्वास हार जाते हैं, आलोचना का शिकार हो जाते हैं, निस्वार्थ सेवाभावियों को ऐसी क्या मलाई मिलती हैं जो संगठन में  कर्मचारियों की सेवा छोड़, पेढ़ियों

को थाम लेते हैं, जबकि प्रथम: प्राथमिकता तो संगठन में रहकर कर्मचारियों की सेवा की होती हैं।

कुछ (बहुत कुछ) संगठन के नेता लोगों

याने कर्मचारियों से काम कराते हैं, और अधिक से अधिक रुपया कर्मचारियों से लेकर अपना बेलेंस बढ़ाते हैं व अपना घर भरते हैं, पहले

बाद में संगठन को जरुरत पड़ने पर जेब खाली बताते हैं, याने संगठन में

समर्पित हैं मगर ईमानदारी व निस्वार्थ भावना से नहीं। यह बुराइयाँ सभी बड़े-छोटे संगठनों व नेताओं में मौजूद

हैं मगर सब जानते हुऐ भी मानते नहीं

यहीं विडंबना हैं। इसमें सबसे बड़ा दोष कार्य, जीवित संपर्क, संगठन की महत्ता की समझ खुद में रखना और नई पुरानी पीढ़ियों की इस संबंध में जागरुकता में आई कमी भी हैं और

नये अधिकारियों की संगठन की उद्योग में क्या आवश्यकता हैं, क्यों जरूरी है, यह कर्मचारियों व उद्योग में सेतु का कार्य, उद्योग में शांति रहे, कार्य अच्छी तरह  से हों, अराजकता

व शोषण ना हों, कार्य में कर्मियों को प्रताड़ना से बचाने, कर्मचारियों का उत्तम स्वास्थ्य हो, उनका कल्याण हो

इसके लिये संगठन होना जरूरी हैं, नये अधिकारियों में यह समझ जरूरी है इसकी ट्रेनिंग इन्हीं मिलना चाहिए। जबकि उन्हें यह बताया जाता है कि

कर्मचारी संगठन नेताओं से दूर रहें, उनकी सलाह ना मानें, कोई बात ना माने कम संपर्क रखें, उन्हें तवज्जों नहीं दे कम बात माने और ज्यादा समन्वय स्थापित करने का " दिखावा मात्र करें " बाकि टालते रहें, नेताओं की  (निजी) स्वार्थपूर्ति परक कुछ कार्य करते रहेंगे तो अधिकारियों को

काम करने में दिक्कतें नहीं आऐगी।

संक्षिप्त में सरकार की संगठन विरोधी नीतियों-कार्यों की वजह से आज सभी कर्मचारी संगठनों की यह स्थिति हैं और प्रशासनिक अधिकारी अपने स्वार्थ के कारण सरकार से जुड़कर रहने की मजबूरी में स्वयं का लाभ समझते हुए सरकार व उसके मंत्रियों की ही सुनते हैं। श्रमिक संगठनों की नहीं।

श्रमिक संगठनों की कर्मचारी यदि ताकत है तो ये ही कमजोरी भी हैं:

- आज का श्रमिक संगठनों से जुड़ना नहीं चाहता। श्रमिक संगठन श्रमिकों के हित के लिए है राजनीति के लिये नहीं, लेकिन भर्ती के समय यह पाठ/संकल्प दिया जाता है कि किसी भी संगठन से कर्मचारी नहीं जुड़ेगा। जबकि जुड़ाव कर्मचारी व उद्योग के हित में होता है और यह जुड़ाव अनिवार्य होना चाहिए। नये कर्मचारियों को और संगठनों के नेताओं और अधिकारियों की इस संबंध में अनिवार्य रूप से 3-3 माह में कार्यशालाओं का आयोजन कराके विशेषज्ञों द्वारा प्रशिक्षण अनिवार्य रुप से होना चाहिए।२।

- मदन वर्मा " माणिक "

  कवि व लेखक

मो. 6264366070