मुफ़लिस

ज़िंदगी मर गई ख़बर न हुई

एक मुफ़लिस की फिर सहर न हुई


आदमी के जहान में भी कभी

आदमी की गुज़र-बसर न हुई


क्या कहीं ज़िंदगी ग़मों से थी

या कभी शाद ही हज़र न हुई


फिर खिज़ा पे बहार आई है

जीस्त इस बार दरगुज़र न हुई


आँख से गिर गए ज़रा हम तो

तेरे कूचे में फिर कदर न हुई


तेरे दीदार के बिना हमदम

फज़्र कोई भी कारगर न हुई


सामने आ गए नज़र वो पर 

चार उनसे मेरी नज़र न हुई


प्रज्ञा देवले✍️