छुपे रुस्तम

"सुनीता,चलो भी अब..कितनी देर लगाती हो तैयार होने में"

पतिदेव कब से आवाजें लगा रहे थे और सुनीता बाहर ही नही आ रही थी।दोनो को किसी के घर गृहप्रवेश की पूजा में समय पर पहुंचना था।राजीव कब से तैयार हो कर सुनीता का इंतजार कर रहे थे।सुनीता जैसे ही तैयार हो कर आई,"तुम औरतें भी न..कभी नही सुधरती..तैयार होने के मामले में हमेशां लेट लतीफ।"

सुनीता,"श्रीमान जी ,क्या करूँ समझ ही नही आ रहा था कौन सा सूट पहनू..कोई बताने वाला तो है नही..आप भी तो कुछ सलाह नही देते।जब पूछो यही कह देते हो कोई भी पहन लो।तुम पर तो सभी अच्छे लगते हैं। बताना तो दूर,आप तो ढंग से देखते भी नही कि मैंने पहना क्या है।"

सुनीता को हमेशां से राजीव से ये शिकायत रहती थी कि वो जब भी कहीं जाने के लिए तैयार होती है राजीव के मुँह से तारीफ के दो बोल सुनने को तरस जाती थी।

"पर तुम इतनी देर लगा कर भी ये  बदामी रंग का सूट  क्यों पहन आयी? अरे भाई कम से कम वो जो गुलाबी रंग वाला पहनती हो वो ही पहन लेती"

सुनीता दो मिनट के लिए हैरान हो गयी और सोच में पड़ गयी,"कौन सा गुलाबी वाला..जरा बताना तो..!!"

"अरे भूल गयी..वो ही जो मल्होत्रा साहब के बेटे की सगाई में पहना था"

"अच्छा सुनिए..मैं पांच मिनट में आई"

पांच मिनट बाद सुनीता जब गुलाबी सूट पहन कर आई तो राजीव मंद मंद मुस्कुरा रहे थे।

ओह तो आज समझ आया जनाब छुपे रुस्तम हैं

और आज पतिदेव की मुस्कान के पीछे छिपे उनके भाव देखकर सुनीता की सभी शिकायतें और गिले शिकवे मिट गए थे ।  मन ही मन मुस्कुराती हुई वो  भी जा बैठी पतिदेव के साथ कार की अगली सीट पर..!!

मौलिक एवं स्वरचित

रीटा मक्कड़