ग़ज़ल : बेवजह कमियां निकाले खुद बने काबिल यहांँ ।

लोग बढ़ने दे नहीं जलते सदा जाहिल यहांँ, 

बेवजह कमियांँ निकाले खुद बनें काबिल यहांँ। 


जीत जाएंगे यहांँ हम रोक कर तो देख लो, 

आज जज्बे को दिखा मंजिल करें हासिल यहांँ। 


अब सियासत खूब करते जो सगे अपने रहें, 

काटते हैं जड़ यही अपने बने कातिल यहांँ। 


बीज बोते नफरतों के तोड़ देते हौसला, 

सब मुखौटे में रहे अपने बने बुजदिल यहांँ। 


खैर जाने दो मगर हम राह अपनी खुद तके, 

हम सजाएंगे मगर अब प्यार की महफिल यहांँ। 


खत्म कर दे नफरतों को प्यार की बौछार से, 

खोल दरवाजा करेंगे रोशनी दाखिल यहांँ। 


आज रस्ता रोकते हैं राह में तूफान ये, 

पर 'अना' बढ़ते रहो बनकर चलो ग़ाफिल यहांँ। 


स्वरचित अनामिका मिश्रा 

झारखंड जमशेदपुर