चौथी लहर

आजकल कोरोना की चौथी लहर से वातावरण गर्माता जा रहा है। इत्मिनानी मिजाज पहले चौकन्ना होना छोड़ देता है। इसीलिए आजकल मास्क गायब हैं। जहाँ हैं वहाँ उनका खेल बड़ा निराला है। किसी की ठुड्ढी पर तो किसी के गले पर सुहा रहा है। जहाँ सुहाना चाहिए वहाँ कोरोना सुहा रहा है। यह सब देखकर लगता है कि नियम कायदे केवल यातायात के ही नहीं कोरोना के भी तोड़े जाते हैं। नो पार्किंग जोन में गाड़ी और नाक-मुँह को छोड़कर हर जगह मास्क दिखायी दे रहा है। मौत की आबोहवा में हथेली में जान लेकर फिरना कोई बच्चों का खेल नहीं है। ऐसे नमूने मास्कधारियों को बॉर्डर पर होना चाहिए। सरकार लाख चाहे अपील कर ले इनके कानों पर जूँ तक नहीं रेंगती। लगता है कोरोनाकाल में जूँ अपने कानधारियों से अधिक समझदार हो गए हैं।

किसी ने नमूने मास्कधारी से पूछ लिया कि कोरोना भगाने का सबसे बड़ा उपाय क्या है, तो उसने मौके पर चौका मारते हुए कहा – करना क्या है, देश भर में तब तक चुनावी रैलियाँ, मतदान करवाओ जब तक ससुरा कोरोना भाग नहीं जाता। फिर देखें कैसे कोरोना दुम दबाकर भागता है। नेताओं के हाथों सतायी गयी अभागी जनता की यातनाओं को देखकर कोरोना की सारी कुटिल चालें धरी की धरी रह जायेंगी। हृदयहीन नेताओं के बीच भोली-भाली जनता की भीड़ देखकर उसके छक्के छूट जायेंगे। वह तो छोटे-छोटे समूहों को तलाशता रहता है। नौकरीपेशा लोगों, व्यस्त गृहणियों और पढ़ने वाले बच्चों की मजबूरी देखकर अपना उत्पात मचाता रहता है। नेताओं की अघोरी चुनावी मुद्राएँ देखकर इसकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती हैं। नेताओं के जोरदार भाषणों में उसे खुद की मौत सुनाई देती है। उसे रैलियों में अपने मौत का तांडव दिखलाई देता है।

अबोध, निरीह बेगुनाह की हालत देख कोरोना भयभीत करने में अपनी मर्दानगी समझता है। दम है तो चुनावी रैली में जाकर दिखाए। उसकी नानी न याद आ गई तो पूछो मत। रैलियों में लोग इतने सट-सटकर खड़े होते हैं कि कोरोना उनके बीच आ जाए तो उसका कचूमर निकल जाए। यदि वह अपना चेहरा दिखा दे उसे झुलसाने से भी लोग पीछे नहीं हटेंगे। इसीलिए कोरोना नेताओं और मतदाताओं से ज्यादा सरकार और भोली जनता को पसंद करता है। वह क्या है न कि चुनावी दिनों में नेता और मतदाता पर मातामाई चढ़ जाती है। इनके आगे जो आ जाए मानो उसकी खैर नहीं। वहीं चुनाव के बाद नेता सरकार में मतदाता आम जनता के रूप में बदल जाते हैं तब उनकी सारी शक्तियाँ टाँय-टाँय फिस्स हो जाती है। वैसे भी यह रोग ऐसा है कि आईएएस के कोर्स में हौव्वा तो नेताओं के आगे बौना सा नजर आता है।

आज कोरोना बीमारी से ज्यादा शिक्षक के रूप में अपना पात्र निभा रहा है। वह दुनिया को समझा रहा है कि कोई भी बीमारी अपने आप पैदा नहीं होती। इसे पैदा किया जाता है। यह मानवीय भूल का नतीजा है। अगर भूल एक से ज्यादा बार हो जाए तो उसे भूल नहीं मूर्खता कहते हैं। ऐसी मूर्खता करने वालों का कोरोना जैसे रोग बुरा नहीं मानते बल्कि बुरा करने में विश्वास रखते हैं।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’, मो. नं. 73 8657 8657