नजर की सोच

ताई! परसों ही माँ को पास के अस्पताल में भर्ती करवाया है। कुछ दिनों से बुखार कम नहीं हो रहा था। रह-रहकर उनकी सांसे फुल रही थीं। हमसे रहा नहीं गया। बड़ी घबराहट होने लगी। जैसे-तैसे अस्पताल लेकर पहुँचे। जाँच करवाई तो पता चला कोरोना पॉजिटिव हैं।  इतना कहते-कहते भजनखबरी भावुक हो उठा। उसने माँ को फोन लगाया और ताई को दे दिया।

ताई – तुझे कितनी बार कहा था कि तबियत का ख्याल रखना। तू है कि अपनी जिद पर अड़ी रहती है। अब देख तेरी क्या हालत हो गयी। टीवी में समाचार वाले बता रहे थे कि मरीजों को बेड नहीं मिल रहे हैं। दवाइयों की कमी है।  मैं तेरे पास आना चाहती थी, लेकिन सब जाने से रोक रहे थे। वैसे भी अस्पताल वाले मुझे थोड़े न भीतर आने देंगे। हमारे यहाँ हर दिन आठ-दस केस दर्ज हो रहे हैं। उनमें पाँच की मौत भी हो गयी। मुझे यह समझ नहीं आता कि तू बिना मास्क के इनसे-उनसे बातें ही क्यों करती थी। घर में रहती। इन अस्पताल वालों का कुछ भरोसा नहीं। किसी भी समय हाथ खड़ा कर सकते हैं। इस बीमारी के चलते मरीज अस्पताल से खाक ठीक हो रहे हैं, बल्कि उल्टे मर रहे हैं। सौ की दवा हजार में बेचने का गोरखधंधा चला रखा है। बेडों की कालाबाजारी जोरों पर है। लूटने को मिले तो वे मरीज की लंगोटी न छोड़ें।

ताई यह सब बातें भजनखबरी की माँ को कहना चाहती थी। किंतु उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा। फोन कान पर लगाकर कहने लगीं – तू भी बड़ा कमाल करती है। तुझे हुआ ही क्या है? इस बीमारी से डरने की जरूरत नहीं है। ये टीवी वाले भी न बेकार में लोगों को डराकर रख देते हैं। सौ में से निन्यानबे लोग यूँ ही ठीक हो जा रहे हैं। एकाध लोग जो ज्यादा चिंता करते हैं या फिर घबरा जाते हैं उन्हीं के साथ कुछ भला-बुरा हो रहा है। तू तो बहादुर है। वैसे भी तेरी कुंडली में सौ साल जीना लिखा है। तू तो हर दिन भगवान की पूजा करती है। भगवान सदा तेरे साथ है। देख दो-चार दिन में तू फिर पहले जैसी चंगी न हो गई तो मैं अपना नाम बदल लूँगी। तू ने बचपन में इससे बड़ी-बड़ी बीमारी देखी है। यह भी भला कोई बीमारी है। इसे तू यूँ मसलकर रख देगी। चल जल्दी से ठीक हो जा और घर आ जा। यहाँ सब तेरी राह ताक रहे हैं।  

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’, मो. नं. 73 8657 8657