अतिसर्वत्र वर्जित है ।

यह एक बोध कथा है जो कहीं मेरे दिल को गहराई तक छू गई ।और आज मैं तुमसे साझा करने जा रही हूं। भगवान बुध का एक शिष्य था श्रोण। श्रोण कभी राजा था। एक बार भगवान बुद्ध उसके राज्य में गए, श्रोण ने उनका उपदेश सुना और उसके मन में वैराग्य जागा।

 तत्काल उसने अपने पुत्र को राज्य सौंपकर मंत्रियों को संरक्षक नियुक्त कर बुद्ध के शिष्य हो गए और भिक्षुओं के साथ चल दिए बुध के अनेक शिष्य थे। परंतु यह अद्भुत शिष्य था।बुद्ध के अन्य शिष्य जितना तप  किया करते थे। श्रोण उनसे दुगना करता था ।शिष्य दो समय  भोजन  करते थे तो वह एक समय लेता था शिष्य यदि एक समय आहार लेते तो वह आहार लेना बंद कर देता था शिष्य यदि भूमि पर शयन करते तो वह कांटे बिछा कर सोया करता था। अन्य शिष्यों ने यह बात महात्मा बुद्ध से कही कि यह इस तरह से मर जाएगा। 

तब बुद्ध ने श्रोण को बुलाया ,और कहा आज मैं तुमसे एक बात पूछना चाहता हूं! मैंने सुना है कि जब तुम राजा थे तब वीणा बजाने का बड़ा शौक था। और वीणाअच्छी बजा लेते थे श्रोण ने  कहा हां भंते यह सही है ।मैं वीणा बजाने में सिद्धहस्त था।

बुद्ध ने कहा मैं यह जानना चाहता हूं ,की वीणा से संगीत कब निकलता है तार ज्यादा कसे हो तब, या तार बिलकुल ढीले छोड़ दे तब? श्रोण बोला नहीं भंते दोनों ही स्थितियों में संगीत नहीं निकलता तार ज्यादा कैसे होंगे तो तार टूट जाएगा ।तब संगीत नहीं निकलेगा । और तार ढीले छोड़ देंगे ,तो भरृ जैसी कर्कश ध्वनि ‌निकलेगी संगीत नहीं बुद्ध ने कहा तो संगीत किस स्थिति में निकलेगा श्रोण ने कहा संगीत तो तभी निकलेगा, जब तार अधिक ना कसे हुए हो और ना अधिक ढीले हो ।अपितु मध्य की स्थिति में सम हो। भगवान बुद्ध बोले श्रोण यही मैं तुम्हें समझाना चाहता हूं।

 जीवन में शांति का परम तृप्ति का आनंद का संगीत जभी निकलता है जब जीवन  समता के मध्य में स्थित होता है जब तू राजा था तो भोग में अत्याधिक लिप्त था। और जब भिक्षुक हो गया ।तो त्याग में भी अति कर दी यह दो हर स्थिति की अति हैं । इसलिए एक सूत्र देता हूं अति को छोड़कर जब तुम मध्य में स्थित हो जाओगे तो तुम शांति का अनुभव करोगे, और यही निर्वाण का सही रास्ता है ।शाश्वत शांति को पाने का यह सही तरीका।।

इसीलिए सही कहा जाता है "अति सर्वत्र व्रजयते"

संकलित

रचनाकार ✍️

मधु अरोरा