सुख

 सुख व दुःख

मन के  ही हैं  क्षेत्र,

ऐहिक सुख,

के साधन बाह्य हैं,

भोग अति रूप है।

परिणाम है,

भोगवाद आसक्ति।

आत्मिक सुख

है मन की जागृति,

जब आत्म  स्थित हो,

मन के तंत्र

आत्मा में, आत्म - रूप।

तो,सुखी जीव ,

होता आत्मानंदित।

दुःख से अप्रभावित।

@ मीरा भारती,

 पुणे,महाराष्ट्र।