गायब होती रीढ़

लीजिए साहब हर दिन गरमागरम मुद्दों से जलाकर मारने वाली मीडिया आज जलकर मरने वालों की खबर दिखाने जा रही थी। कुल सत्ताईस लोग मरे थे। इस खबर से मीडिया में एक ओर दुख तो दूसरी ओर खुशी का वातावरण छाया हुआ था। दुख इस बात का कि हमारे रहते जलाने का जिम्मा कोई और कैसे उठा सकता है। हमारे जलाने में क्या कोई कमी रह गई थी जो हमसे होड़ लेने नए-नए बंदे मार्केट में उतर आए हैं। दूसरी ओर खुशी इस बात का कि मीडिया की तुलना में जलकर मरने वालों की संख्या समुद्र में एक बूँद के बराबर भी न थी। पहले बंदूकें ईमानदार थी, इसलिए बदनाम थी। शोर-शराबा ज्यादा होता था। आज बंदूकें मीडिया का साइलेंसर लगाकर चलाई जा रही हैं। कभी हिंदू-मुस्लिम का बुलेट तो कभी अजान-चालीसा का बुलेट लिए।

बहुत दिनों बाद आज मीडिया वाले स्टूडियो के बाहर की दुनिया दिखाने वाले थे। नहीं तो दिन भर स्टूडियो में चार-पाँच छोटी-छोटी खिड़कियों में से झांककर देखने वाले चेहरों के साथ बात करने में अपने पिछवाड़े की धन्यता समझते थे। एक रिपोर्टर अपने कैमरामेन के साथ घटनास्थल पर पहुँचा तो कई जलकर राख हो गई लाशों में से किसी एक की रीढ़ की हड्डी दिखाई दी। यह देखने की देर थी कि मीडियाभर में तहलका मच गया कि मरने वाला रीढ़धारी था। मांस के लुथड़ों में रहने वालों के बीच रीढधारी का होना बलात्कारियों के बीच एक भोली-भाली अबला का होना था।

देश में वैसे तो रीधधारी बचे नहीं, जो बचे वह तो तर्क के साथ बहस करने वाले थे। मीडिया के अनुसार रीढ़ वाले प्रश्न करते हैं। तर्क-वितर्क करते हैं। बढ़ती कीमतों पर सरकार को लताड़ते हैं। पेट्रोल-डीजल-गैस सिलेंडर की कीमत बढ़ने पर आए दिन हंगामा करते हैं। ऐसी प्रवृत्ति वाले देश के विकास के लिए घातक होते हैं। ये लोग जुमलों को पकड़ने में तेज, दाढ़ी में से तिनका निकालने में समर्पित और अच्छे दिन बोलने वालों की बैंड बजाने वाले हैं। ऐसे लोग आतंकवादी होते  हैं जो दूर की हाँकने वालों  को अपने तार्किक विचारों से धराशायी कर देते हैं। किसी भी देश का विकास रीढ़ की हड्डी वालों से नहीं रंग-बदलने वाले गिरगिटों से होता है। ये गिरगिट आए दिन इतने रंग बदलते हैं कि चुनाव के पहले वे आपको बुरे लगते हैं जबकि चुनाव के दिन वे ही देशभक्त लगते हैं।

अब ऐसे देशों के समूह ने रीड़ वालों को देखते ही भुनने का आदेश जारी कर दिया गया है। वैसे इस आदेश से किसी को डरने की आवश्यकता नहीं है। चूंकि उन्हें दाल-आटे, तेल की चढ़ती कीमतों  के बीच रहने के लिए अपनी रीढ़ कब की गायब कर ली है।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’, मो. नं. 73 8657 8657