देवता सो गये : देवता जाग गये !

हमारी संस्कृति वर्तमान में जिस संक्रमण काल से गुजर रही हैं इस दौर में, जहाँँ पम्परागत धारणाएँँ मान्यता विश्वास संस्कार टूट रहे है ; वहीं नए आयाम स्थापित होने की संभावना भी बनी हुई है। कोई भी संस्कृति अपने परिष्कार को तभी औचित्यपूर्ण मानती है जब उसका संस्कार सामान्य जनसमुदाय के लिए कल्याणकारी होने का मार्ग प्रशस्त करते है।

विषमता और विसंगति के तत्त्व संस्कृति में कभी नहीं आते, इन तत्वों को मानकर विरोध करने वाले लोग वास्तव में सांस्कृतिक नहीं होते।ऐसे असांस्कृतिक लोग स्वच्छंद आचरण से प्रकृति की प्रतिकूल आचार अपनाते हैं ऐसे असामाजिक तत्त्व सहिष्णु प्रकृति के न होकर हिंसक होते हैं। कोई भी सांस्कृतिक संस्कार तब तक स्थाई और सर्वमान्य नहीं हो सकते जब तक वह संस्कृति के अपने समान्तर चल रहे विचार, विश्वास ,मान्यता,परम्परा, धारणा के समक्ष खड़ी होकर चुनौती न दे और उपयोगिता के मानदंड पर खरे उतरे।

लोग संस्कृति की दुहाई ऐसे ही नहीं देते। भले सांस्कृतिक परम्परा से अज्ञानी हो। संस्कृति मानवीय जीवन का नियामक तत्त्व है। संस्कृति भले ही अमूूू्र्त हो परन्तु इसके उपादान और परिणाम मूर्त होते है।

कोई भी संस्कृति मानवीय जीवन के प्रतिकूल नहीं है न हीं प्रकृति विरुद्ध । भौतिकवाद और विज्ञान के विस्तार ने मानवीय जीवन को उलझा दिया । तार्किकता बौद्धिकता सृजनात्मकता के स्थान पर स्वार्थ लोलुप आचरण स्वछंद और विलासिता के आचरण को बढ़ावा दिया । संस्कृति के इस संक्रमण काल में बौद्धिक वर्ग को परिष्कार करना होगा । विज्ञान के चमत्कार ने भले ही धर्म,संस्कृति,समाज, विचार, विश्वास, धारणा,आस्था,श्रद्धा,भक्ति इन सामाजिक नियामक तत्त्वों के प्रति भ्रम का वातावरण बना दिया परंतु बौद्धिक वर्ग को नए सिरे से उपयुक्त सारे तत्त्वों पुनर्व्याख्या करनी होगी । लोग भ्रम में इस कारण हैं क्योंकि संस्कृति के नियामक तत्वों की वैज्ञानिकता के आधार पर पुनः व्याख्या नहीं हुई ।संस्कृति की मान्यताओं के हेतु बड़े तार्किक होते हैं ।भौगोलिक, जैविक,सामाजिक, स्वास्थ्य,आर्थिक अनेक हेतु को दृष्टिगत करके ही नियामक तत्व संस्कृति के अंग बने है।

हमारी संस्कृति में न जाने किस काल से एक मान्यता है ” देवता सो गए ; देवता जाग गये ” आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है । हमारी मान्यताएँँ हैं इस दिन देवता सो जाते हैं और कार्तिक मास की शुक्लपक्ष एकादशी को जाग जाते हैं । इस तिथि को देवऊठनी एकादशी कहते हैं। इस दौरान शुभ कार्य नहीं करते।

देवता कैसे सो सकते हैं ? हम सृष्टि के संचालक देवों को मानते हैं और वह सो गए। यह संकेत अच्छा नहीं है ! या सुलाये गये हैं ?

किसी परिवार का वरिष्ठ सदस्य है गहरी नींद में सो जाए जागने का नाम ही न ले तो क्या उस घर में चोरी और डाके का भय नहीं बन जाता। ऐसा भी न हो तो गृह क्लेश तो अवश्य ही होगा। कहने का आशय है कोई उत्तरदायित्व असंवेदनशील हो जाए तो अनिष्ट की आशंका उत्पन्न हो जाती है।

दूसरी बात समझे कोई व्यक्ति अत्यन्त परिश्रम से थक जाए, फिर वो विश्राम करें नींद आने के कुछ देर पश्चात उसे जगाये और कहें काम करो तो क्या वह काम करने के लिए तत्पर होगा ! दो स्थिति होगी ; एक तो उसे जगाने पर क्रोध आएगा हो सकता है प्रतिक्रिया में हाथ भी उठ जाए। या फिर जाग जाये तो आलस्य और तन्द्रा की अवस्था होगी और कार्य नहीं करेगा।

अब सोचो देवता सो गए तो सृष्टि में हाहाकार मचाने के लिए राक्षसी शक्तियाँ हावी नहीं होगी, सृष्टि में नित्य आशंका बनी रहनी चाहिए !

जब हमने देवो को सुला ही दिया तो क्यों नित्य प्रति प्रातः संध्या आरती करके उन्हें जगाने की चेष्टा करते हैं। नहीं करनी चाहिए ऐसी चेष्टा ! क्यों विघ्न डाले उनके विश्राम में ? वरना ! स्थिति ऊपर कही है वह होगी ।

यथार्थतः देव सोते नहीं है। पूछो क्यों ! चलो मत पूछो ? मैं बता देता हूँँ । देवता सोते नहीं है ; हमारी संस्कृति नियंता मनस्वेत्ताओं ने संस्कृति में हमारी भौगोलिक आर्थिक सामाजिक दशाओं के कारण ऐसा प्रावधान किया था ।

यह सार्वभौमिक सत्य है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है । अधिकतर आबादी गाँँवों में निवास करती है।गाँँव में सांस्कृतिक परंपरा जीवित रहती है। भारत की कृषि मानसून की वर्षा पर निर्भर है । पुरातन समय में सिंचाई के साधन कहाँँ थे आज भी सिंचाई सुविधाओं का अभाव है।

इस वक्तव्य को देवशयनी और देवऊठनी एकादशी से जोड़कर देखें तो मानना पड़ेगा हमारी भारतीय संस्कृति विश्व संस्कृति से श्रेष्ठ है ।जब तक कोई परम्परा धर्म से नहीं जुड़ जाती सामान्य जन उसे से मानता नहीं है ।

देवता सोते हैं और जागते हैं । इन तिथियों के मध्य अंतर चार मास का है। देवता जब सोते हैं उस समय भारतीय महाद्वीप में मानसून सक्रिय हो जाता है।खरीफ की फसल जिसे कहते हैं उस की बुवाई का समय है। संपूर्ण भारत में कृषि बुवाई होती है। इस फसल का जीवनचक्र भी चार मास का है। इसी वर्षा कालीन माह के चार माह को ‘चौमासा’ कहते हैं। इन्हीं तत्वों को ध्यान में रखकर हमारे मनस्वेत्ताओं ने सोचा इन चार माह में शुभ कार्य उत्सव पर रोक लगाये तो ग्रामीण कृषि कर बारह मास का अन्न उत्पन्न कर लेंगे ।

कृषि अर्थव्यवस्था तथा रोजगार का आधार भी था। कृषि की सुरक्षा के लिए ही सारा चक्र गढ़ा गया। फसल पक कर तैयार हो जाती हैं तब देवता भी उठ जाते हैं और मानसून भी विदा ले लेता है। यदि इस दौरान उत्सव की धूम-धाम रहे शुभ कार्य हो तो कृषि चौपट हो सकती है । इन्हीं सारे तत्वों को ध्यान में रखकर के यह सारे प्रावधान किए गए फिर उत्सव शादी समारोह के धूम-धड़ाके के साथ माहौल खुशनुमा हो जाता है क्योंकि हम घर पर अन्न है और देवता भी जाग गए !

संक्षिप्त परिचय- ज्ञानीचोर

मु.पो. रघुनाथगढ़, सीकर राजस्थान।

मो. 9001321438