माँ की ममता

बचपन में जब मैं डर कर उठ जाती,

माँ मुझे लोरी गा कर सुलाती,

चलते - चलते मैं लड़खड़ा जाती,

माँ उंगली पकड़ चलना सिखाती,

कभी मैं अगर गिर जाती,

मेरे रुदन पर माँ भागी चली आती,

माँ के सो जाने पर मैं,

चुपके से उठ जाती,

पहन माँ की साड़ी मैं खूब इठलाती,

शरारत कर के जब कोई मैं,

 माँ के आँचल में छुप जाती,

फिर मुझे गोद में बिठा कर 

माँ समझदारी का पाठ पढ़ाती,

बचपन से लेकर आजतक 

जब भी मैं रुकी जाती हूँ

माँ मुझे हौसलों से भर देती

जब भी मुझे किसी दोस्त की

कमी हुई जीवन में मेरे 

माँ सबसे अच्छी मेरी सहेली बन जाती

इन अनगिनत बातों का कोई अंत नही

बहुत मुश्किल है माँ के प्रेम को 

शब्दों में व्यक्त करना।


-- लवली आनंद

मुजफ्फरपुर , बिहार