मेरी पहली हवाई यात्रा

वह हमारी पहली हवाई यात्रा थी। कभी हम टिकट पर ‘सिर झुकाए हमारी खातिरदारी के लिए उतावले महाराज’ को देखते थे, तो कभी वो हमें देखता था। अंदर की बात तो यह है कि न मैं उसे देखता था न वह मुझे, बल्कि दुनिया को दिखाना चाहता था कि मैं हवाई यात्रा करने जा रहा हूँ। इससे गजब रौब जमता है। ऐसा करने से गर्दन समकोण में और हम अहंकोण में पहुँचकर घमंडी होने का परमसुख प्राप्त कर सकते हैं। वैसे भी जो दिखावा न कर सके उसे हवाई यात्रा करने का अधिकार नहीं होना चाहिए। ऐसे लोगों की हवाई यात्रा पर बैन लगा देना चाहिए। अथवा अनागरिक घोषित कर भारी-भरकम जुर्माना ठोक देना चाहिए। इस मामले में मेरा कोई सानी नहीं है। मैं दिखावे के सिवाय कुछ करता ही नहीं। पानी का गिलास भी होंठों से यूँ स्पर्श कराता हूँ जैसे मेरे होठों के स्पर्श से स्टील का गिलास टूट न जाए। बार-बार चश्मे की दंडी को इस तरह से हिलाता हूँ जिससे कि लोगों को पता चल जाए कि मैं बहुत बड़ा विद्वान हूँ। हवाई अड्डा तो क्या मैं शौचालय जाने तक के लिए अंग्रेजी समाचार पत्र का इस्तेमाल करता हूँ। इससे स्टेटस बढ़ता है। लोग सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। हाथ में हिंदी समाचार पत्र हो तो समझो गए काम से। आवारा, गंवार और फिसड्डी कहलाने में देर नहीं लगती।

हवाई अड्डा पहुँचते ही मन आत्मियाना (सेल्फियाना) हो उठा। झट से पॉकेट में से ‘कटे सेब के ब्रांड वाला मोबाइल’ निकाला और कैमरे की फ्लैश लाइट से चौंधियाने और खिचिक-खिचिक की आवाज से खिचखिचाने तक फोटो उतरते रहे। सूरत कैमरे के लायक है या नहीं, यह मैं ठीक-ठीक नहीं बता सकता लेकिन इतना विश्वास के साथ अवश्य बता सकता हूँ कि कैमरा के फिल्टर मेरी सूरत के लिए ही बने थे। एक से बढ़कर एक तस्वीरें आयीं। इतनी बढ़िया तस्वीरें देखकर किसका मन नहीं ललचाएगा। मैं अतिम सांस गिन रहे पिता के मुख में तुलसी जल डालने में देरी कर सकता हूँ लेकिन सोशल मीडिया पर फोटो अपलोड करने में कतई नहीं। स्टेटस का सवाल भी तो कुछ होता है। हवाई अड्डे जैसे स्थानों पर शरीर में डीप फ्रीजर जैसी कड़ाके की जकड़न और अकड़न होनी चाहिए। सबकी नजर हम पर और हमारी नजरे रेबन के काले-काले गॉगल्स के भीतर से मंद-मंद मुस्कुराते हुए फूले नहीं समाता है।  हाँ इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए कि हवाई अड्डे पर अपनी जान-पहचान वाला कोई मिल जाए तो अपने अहंकार ग्राफ को कभी नीचे न आने दें। प्राण जाए पर अहंकार न जाए।

कबूतर खाने वाली जैसी सीटों पर हम तीन यात्री बैठ गए। मुझे खिड़की मिली। मैं कभी खिड़की के बाहर झांकता तो कभी बगल में। मानो ऐसा लगता जैसे मैंने तीनों जहान जीत लिए। थोड़ी देर के लिए ही सही ऐसा लगा जैसे मेरा जन्म लेना सार्थक हुआ। मैं अपने बगल वालों को चिढ़ाने वाली नजरों से घूरता। कमाल की बात तो यह थी कि मेरी बगल में एक बच्चा बैठा था। वह बार-बार मेरी सीट पर बैठने की जिद कर रहा था। उसकी माँ उसे बार-बार ऐसा करने से रोक रही थी। शायद उन्हें मेरी चाल-ढाल से पता चल गया था कि मैं पहली बार हवाई यात्रा कर रहा हूँ। उन्होंने मुझे ऐसे देखा जैसे मैंने उनकी संपत्ति मांग ली हो। तभी खूबसूरत सी हवाई बाला मेरे पास आयी और बोली – सर! प्लीज़ फैसन युअर सीट बेल्ट। यह सुनकर मैं ऐे-ऐं करता रहा और बगल वाली महिला मुझ पर हँसती रही। शयद उसे मेरी अंग्रेजी का सच्चा ज्ञान हो गया था। हवाई बाला मेरे चेहरे पर बजे बारह को समझ गई और हिंदी में कहा – कृपया अपनी सीट बेल्ट बांध लें। उसके इतना कहते ही मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मुझसे मेरा अहंकार छीन लिया हो। मैं शर्म से पानी-पानी हो गया। इसके बाद मैं ऐसा सोया कि अपने गंतव्य स्थल पहुँचने तक उठने का नाम न लिया।    


डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त, मो. नं. 73 8657 8657