समसामयिक गीत

गीत प्यार के कैसे गाऊं,मौसम है बारूदी !

खुशियां तो हर रोज़ सिसकती,हर ग़म है बारूदी !!

अविश्वास पल रहा दिनोंदिन,

दिखता वहम,चरम पर

अधिकारों का दुरुपयोग है,

दुनिया बैठी बम पर

किससे बोलें,किसे सुनाएं,हाक़िम है बारूदी !

खुशियां तो हर रोज़ सिसकती,हर ग़म है बारूदी !!

चहरों से मुस्कानें गायब,

हर इक है आतंकी

पूरब,पश्चिम,उत्तर,दक्षिण,

हर इक करता मन की

सभी जगह नकलीपन बिखरा,मातम है बारूदी !

खुशियां तो हर रोज़ सिसकती,हर ग़म है बारूदी !!

सारा तंत्र हुआ बेढंगा,

हैं बदमाश हवाएं

अंतर्मन में व्देष पल रहा,

कपटी हुई फिज़ाएं

मंत्री,प्यादा,सैनिक,राजा,बेग़म है बारूदी !

खुशियां तो हर रोज़ सिसकती,हर ग़म है बारूदी !!

                 --प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे