साहित्यकार

आज अक्षरा बहुत प्रसन्न थी, समाचार पत्रों और एक मैगज़ीन में भी उंसकी लिखी कहांनी छपी थी। बड़े शान से सहेलियों को शाम को पार्क में बताया, पता है मेरी लिखी कहानियों की किताब भी आ गयी और बहुत खुशी होती है जब समाचार पत्र, मैगज़ीन में रचनाओं के नीचे अपना नाम देखती हूँ।

पूजा ने सवाल किया, "वाह, बहुत खुशी की बात है, पर ये बताओ, कितना परिश्रम तुम भी करती हो, तुम्हारी लेखनी भी थक जाती होगी, दिमाग हमेशा चिंतन में लगा रहता है, इसका तुम्हे पारिश्रमिक भी कुछ मिलता है, या ठन ठन गोपाल ही है, पता है, मैंने ऑनलाइन साड़ी का व्यापार शुरू किया, अच्छा लाभ मिलता है, मेरा जेब खर्च तो चल ही जाता है।"

अक्षरा ने जवाब दिया, "जिस दिन कहानीकार ये सोचने लग जाएगा कि वो पैसे के लिए लिख रहा है ,उस दिन से ही वो साहित्यकार न होकर व्यापार करने वाला व्यापारी बन जाएगा। हम साहित्यकार सृजन करते है शब्दों और अक्षरों का व्यापार नहीं। तुम साड़ी का व्यापार करती हो और मैं व्यापारी नहीं हूं।"

वहां बैठी दूसरी सखियों ने अक्षरा की पीठ ठोंकी, "क्या गजब कहा, जैसे लिखती हो, लिखती रहो, हमे गर्व है कि हमारी सखी साहित्यकार है।"

स्वरचित

भगवती सक्सेना गौड़

बैंगलोर