एक नया फैसला

दस दिन बाद नीलम की अक्षरा बेटू चार वर्ष की हो जाएगी, कुछ दिनों से बहुत अनमनी सी रहती थी। जब नीलम ने बहुत प्यार जताते हुए पूछा, 'बेटी, क्या हुआ तुम्हे, तुमने आज दूध भी नही पिया।"

"मम्मा, वो ऊपर जो आकाश रहता है, वो अपनी छोटी सी बहन सृष्टि से खेलता रहता है, मुझे छूने भी नही देता, हमेशा बोलता है, मेरी बहन है। मुझे भी वैसी ही एक बहन चाहिए, मुझे अब खिलौने वाली डॉल नही चाहिए, सच्ची मुच्ची की लाओ, कहाँ मिलती है।"

नीलम उंसकी बातो से सिहर गयी, और अपने मन के भादो की ऋतु को भी वो रोक नही पायी। फिर हवाएं उसे चार वर्ष पहले का वो दिन याद कराने लगी, जब डॉक्टर ने आनंद से कहा था, अब आप एक बेटी में ही संतोष करिएगा।

एकाएक नीलम को एक उपाय सूझा और उसने रात में आनंद को अपना प्लान बताया।

अक्षरा के जन्मदिन पर इस बार एक अनाथाश्रम में वो लोग कुछ नए कपड़े और फल लेकर गए। वहां पर अक्षरा के हाथों से ही बटवाया और एक प्यारी सी दो वर्ष की बच्ची को नीलम ने गोदी में उठाया। ध्यान से देखा तो यूँ लगा अक्षरा का ही रूप है। तुरंत दोनो ने एक दूसरे से बात करके वहां के अधिकारी से बात की। 

बच्ची का हाथ अक्षरा को पकड़ाया, लो बेटी, ये तुम्हारा जन्मदिन का उपहार है, आज से इसका नाम अपर्णा होगा।

चलो हम घर चलते है, पापा कुछ घंटों बाद उसे घर लेकर आएंगे।

और शाम को घर मे जश्न मनाया जा रहा था।

स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित

भगवती सक्सेना गौड़

बैंगलोर