एक अदद कार पार्किंग की जगह

एक बड़े से शॉपिंग मॉल के कार पार्किंग  में एक से बढ़कर एक चकाचौंध वाली कारें पार्क की गई थीं। निराकार और साकार के बीच ये भौतिकीय कार ही परमसत्य होने का भ्रम फैला रही थीं। इसी कार पार्किंग में एक पढ़ा-लिखा हाई-फाई किस्म का एक युवक सूली पर चढ़ाए किसी पैगंबर की तरह लंबी तानकर सो रहा था। मैंने उसे पास जाकर जगाया। उससे कहा – ऐसी पावन मुद्रा में यहाँ क्या कर रहे हो? एक क्षण के लिए भ्रम हो रहा था कि कहीं साक्षात परलोक से इहलोक में प्रभु तो उतर नहीं आए हैं! जानते नहीं कि यह तुम्हारे नहीं कार के आराम करने की जगह है।

उसने बड़े इत्मिनान के साथ कहा – मैं जानता हूँ। लेकिन आप यह नहीं जानते कि इंसान जैसे-तैसे झुग्गी-झोपड़ी, मलीन बस्तियों, गंदे नालों के किनारे रह लेगा, कार नहीं रह पाएगी। इंसान समझौता कर लेते हैं इसीलिए यह दुनिया चल रही है। कारें समझौता नहीं कर सकतीं। इसीलिए मुझे इस तरह यहाँ सोना पड़ रहा है।  

मैं अभी भी उसकी बातों से सिविल की परीक्षा में पूछे गए सवालों की तरह कंफ्यूज था। मैं कुछ समझता उससे पहले ही वह परमात्मा की तरह मेरी दुविधा भांप गया। उसने कहा – आप अधिक सोचिए मत। आपको और भी कई काम है। उसके लिए दिमाग की जरूरत पड़ेगी। तब सोचिएगा। जहाँ तक सवाल मेरे यहाँ लेटने का है तो आपको बता दूँ कि मेरे पिताजी कार में सवार होकर जाम में फँसे हैं। जाम से पहले ही उनका माथा ठनका हुआ है। यदि कार पार्किंग की जगह नहीं मिली तो पागल भी हो सकते हैं। वे हमारे घऱ का बोझ उठाने वाले एकमात्र कमाऊ प्राणी है। ऐसे में उनका पागलपन हमारा परिवार बर्दाश्त नहीं कर सकता। उन्होंने ही मुझे फोन कर सुझाव दिया था कि मुझे यहाँ इस मुद्रा में लेटना है। वह देखिए मेरे पिताजी हॉर्न बजाते आ रहे हैं। कृपया हट जाइए ताकि मैं उन्हें पार्किंग करने की जगह दे सकूँ।    

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त, मो. नं. 73 8657 8657