फटा पोस्टर

हमारे एक मित्र हैं। पढ़े तो आठवीं तक हैं, वह भी तीन-तीन बार। घर वालों को जब लगा कि उनका कुछ नहीं हो सकता तो किसी पोस्टर बनाने वाले की दुकान पर लगवा दिया। पोस्टरों की सबसे ज्यादा जरूरत झूठों और मक्कारों को होती है। इसलिए वहाँ राजनैतिक दलों के लोगों की चहलकदमी अधिक थी। झूठ का व्यापार इतना हाई-फाई था कि वहाँ कारों का तांता लगा रहता था। जबकि दुकान के ठीक सामने कड़ी धूप में ईमानदारी से अमरूद बेचने वाली बुढ़िया जस की तस बैठी रहती थी। एक ही सड़क पर दो नजारे - झूठ कार में और सच पसीना पोछता पैदल चलता हुआ दिखाई देता था। फटे पोस्टर से मुखवाले मित्र को चकाचौंध पसंद आ गई। वह नेताई गुर सीख बैठा। शामिल हो गया किसी नागनाथ-सांपनाथ पार्टी में और डंसने लगा सभी को। अब आए दिन किसी न किसी घटना को लेकर समाचार पत्र में उसकी तस्वीरें छपती रहती थीं।

एक दिन वह मेरे पास आया। साथ में लाए लिफाफे में से कोई कागजात निकालते हुए मेरे हाथों थमा दिया। भारी-भरकम अंग्रेजी में कोर्ट कचहरी से उसके नाम बुलावा आया था। मैं पढ़ते हुए घबरा रहा था वह सुनते हुए मुस्कुरा रहा था। वह मेरे हाथों से कागजात  लेते हुए कहने लगा - तुम अच्छा पढ़ लेते हो। देखकर अच्छा लगता है। पढ़े-लिखे न होते तो तुम्हें कहीं चुनाव में लड़वाकर माला पहनवा देता। दुर्भाग्य से तुम पीएच.डी हो। फलां राज्य में चपरासी की भर्ती निकली है। बीस हजार पीएच.डी. धारियों ने आवेदन किया है, तुम भी कर दो। किसे पता तुम्हें ही मिल जाए। जैसी तुम्हारी माली हालत है उसमें  चपरासी की नौकरी भी बहुत है। मुझे तुम पर दया आती है। हिसाब से देखा जाए तो कुर्सी-मोह और माला-मंच का हकदार वही होता है जो पढ़ाई छोड़ दे और भड़काऊ भाषण के लिए मुँह को काम दे। जो कि तुमसे होगा नहीं। पता नहीं ये लेख-फेख लिखने से तुम्हें क्या पैसे मिलते होंगे। अच्छा होगा कि हमारी रैलियों में शामिल हो जाओ। एक बिरयानी पैकेट, पाँच सौ रुपए और पौवा अलग से। अच्छा लगे तो बता देना। अब मैं चलता हूँ।

मैंने उसे रोकते हुए कहा – अब आ ही गए हो तो नाश्ता-वाश्ता करके जाते। इतना सुनना था कि वह मुझ पर बरस पड़ा – न बाबा न। मुझे पता है तुम नाश्ते में सूखी पाव रोटी खाते हो। कभी मैं भी ऐसी बेकार चीज़ें खाता था। अब मैं सिर्फ और सिर्फ शुद्ध घी और बादाम लेता हूँ। तुम पढ़े-लिखे न होते तो तुम भी बादाम खा सकते थे। प्रकृति का नियम है कि बेरोजगार पीएच.डी धारी बादाम नहीं पचा सकते, पेचिश लग सकती है। इसिलए बिना घी के जियो मस्त हो के। पाव रोटी खाओ और बेरोजगारी के गुण गाओ।

इतना कहते हुए मित्र चला गया। जाते समय वह पहली बार मुझे किसी दार्शनिक से कम नहीं लगा।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त, मो. नं. 73 8657 8657