"हिपॉक्रसी यानी कि (पाखंड) हमारे समाज की झगमगाती पहचान है"

हमारे समाज में उपर से सारी बातें, सारे मुद्दें सात्विक लगते है। कुरेदकर देखेंगे तब पता चलेगा हर इंसान के मानस खोखले और पाखंड से भरे पड़े है। इक्कीसवीं सदी में आधुनिकता सिर्फ़ लाइफस्टाइल बदलने में ही कामयाब रही है, कुछ लोगों की मानसिकता आज भी अट्ठारहवीं सदी पर खड़ी मुस्कुरा रही है। हर इंसान के व्यवहार में हिपोक्रेसी पनप रही है। खासकर महिलाओं के प्रति दोहरा व्यवहार सोचने पर मजबूर करता है। एक तरफ़ हम कहते है हम इक्कीसवीं सदी की दहलीज़ पर खड़े है विचारों में मुखरता लानी चाहिए, और दूसरी तरफ़ हर रोज़ पत्रिकाओं में स्त्रियों के प्रति हो रहे अत्याचारों की भरमार छपती है। कुछ मर्दों को हर राह चलती अकेली लड़की मौका लगती है, क्यूँ उसे कोई अपनी ज़िम्मेदारी नहीं समझता। इस आधुनिक युग में बेशक स्त्रियों की परिस्थिति में कुछ बदलाव आया भी है पर कितनी प्रतिशत महिलाएं आज संपूर्ण सुखी और आज़ाद है? 

जैसे हाथी के दांत चबाने के और दिखाने के और होते है वैसे ही समाज में स्त्रियों के प्रति दोहरा अभिगम दिख रहा है।

हम समझते है की आज की स्त्री आज़ाद और सुखी है, अपने दायरे से निकलकर आसमान छू रही है, पर..पर कितनी औरतें? महज़ 40% बाकी औरतों के लिए आज भी वही अठारहवीं सदी वाले हालात ही रहे है।

लोग कहते है हमने हमारी बेटी को हमने एमबीए तक पढ़ाया, कोई कहता है हमने बेटी को डाॅक्टर बनाया पर इनके पीछे छुपी मानसिकता यही रहती है कि बेटी को अच्छा घर और वर मिले ताकि ज़िंदगी भर के लिए बेटी की फ़िक्र न करनी पड़े। बहुत कम लोग बेटी को पैरों पर खड़ी रहने के लिए पढ़ाते है। 

आज भी कुछ स्त्रियों के लिए कुछ भी नहीं बदला। हाई सोसायटी से लेकर पिछड़ी जाति तक स्त्रियां घरेलू हिंसा का शिकार होती रहती है। हमें सिर्फ़ हमारे आसपास के वातावरण का पता होता है, पर आज भी हर रोज़ कहीं न कहीं से स्त्रियों पर हो रहे अत्याचारों की खबरें छपती रहती है। आम इंसानों की हरकतें बाहर आती है और उपरी वर्ग की दब कर रह जाती है। हमारी आँखों के सामने आज भी बहुत सारी स्त्रियों का शोषण होते हम देखते है। सिर्फ़ हमारे देश में ही नहीं। हर देश में महिला पुरुष कर्मचारी सहकर्मी के हाथों यौन उत्पीड़न की शिकार होती ही है। जिन देश और वर्ग को हम पढ़ा लिखा और आधुनिक समझते है वहाँ भी औरतें शोषण का शिकार होती है। 

लिबरल पार्टी ऑफ ऑस्ट्रेलिया की पूर्व कर्मचारी ब्रिटनी हिगिंस ने कहा था कि एक मंत्री के कार्यालय में उनके सहयोगी ने उनका बलात्कार किया, हिगिंस की इस कहानी के सामने आने के बाद कई स्त्रियों ने अपने साथ हुए यौन शोषण और दुराचार की बातें साझा की। सेक्स डिस्क्रिमिनेशन कमिश्नर केट जेनकिंस ने कहा है कि पीड़ितों में काफ़ी बड़ी संख्या महिलाओं की है। सेट द स्टैंडर्ड शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में पाया गया कि 51% कर्मचारी किसी न किसी रूप में बुली, यौन उत्पीड़न और यौन हमले की कोशिश का शिकार होती है।

आज भी बहुत सारी बहनें पितृसत्तात्मक सोच की शिकार है और शराबी पतियों के हाथों प्रताड़ित होती रहती है। बहुत कम माँ बाप-हिम्मत करते है ससुराल में दु:खी बेटी को वापस लाने की। और ज़्यादातर बेटियां भी बहुत सारी वजहों से या तो सहती रहती है या स्यूसाइड कर लेती है। अभी वो दिन बहुत दूर है जब हर स्त्री आज़ादी की सांस ले पाएगी। दहेज़ के मामले में भी दो राय दिख रही है बेटी को दहेज देना नहीं चाहते, पर बहू से दहेज की उम्मीद जरूर रखते है। क्यूँ? तो कहेंगे बेटे को पढ़ाने में लाखों खर्च किए है। अरे तो क्या बहू के बाप से वसूल करोगे? आपके बेटे को इतना दमदार बनाओ की खुद के दम पर आगे बढ़े और पत्नी के माँ-बाप की भी ज़िम्मेदारी उठाएं। दहेज के मामले में भी कई लड़कियाँ दमन सहती है या तो खुदकुशी कर लेती है। 

"ज़हर से भी ज़हरिली ज़िंदगी की सच्चाई है, रुबरु होती है ज़िंदगी जिसकी कोख में वही ज़िंदगी के हसीन पलों की मोहताज होती है" 

आए दिन चार महीने की बच्ची से लेकर पच्चास साल की औरत के साथ हो रहे बलात्कार की घटनाएं पत्रिकाओं की शोभा बढ़ाती रहती है। कहीं सबूतों के अभाव में कहीं बदनामी के डर से किस्से दब जाते है। तो कभी कुछ किस्सें बड़े बड़े घरानों की आन, बान और शान के आगे दम तोड़ते हार जाते है। कायदे कानून की कछुआ चाल जितनी मंद कारवाई और शक की बीना पर दरिंदों को छोड़ने वाली नीति भी एक कारण है ऐसी घटनाओं को बढ़ावा देने का।

स्त्री दर्द को हीरों की तरह पहनती है, स्त्री का जिस्म ज़िम्मेदारी, अवहेलना, तानें, उल्हाने, वहशीपन, दरिंदगी, मार और पितृसत्तात्मकता के ज़ेवर से सजा है। यह जो धरती के साथ तुलना करते हुए शक्ति के रुप में सदियों से स्थापित कर दी गई है उस सम्मान का खामियाजा भुगत रही है हर स्त्री। स्त्री ज़ात जो ठहरी, लादी गई रवायतों के विद्रोह में सर उठाना शोभा कहाँ देता है..अभी दूर है वो दहलीज़ जिस पर बैठे पीठ पर लदे बोझ को उतार फैंकेगी। स्त्री सांसारिक सुखों को चखने की ज़ुर्रत नहीं करती, उसे सीखाया गया है समर्पित होना, आँसूओं का स्वाद भाता हो जिसे उसके आगे क्यूँ कोई परोसेगा मुस्कान की मीठाई। तो क्या हुआ कि नामी परिवार से है, तो क्या हुआ कि शराबी और दरिंदे सरताज की जोरू है, तो क्या हुआ कि आम औरत है, है तो महज़ अबला हर किसीको हक है अबला के उपर अत्याचार करने का। 

उपर उठने की जद्दोजहद की कोई गुंजाइश ही नहीं क्यूँकि पल-पल मरने के लिए ही लड़कियां जन्म लेती है। सदियों से चली आ रही परंपरा के यज्ञ में समिध सी होमी जाती है अबलाएं, जन्म होते ही बेटी का आह निकल जाती है परिवार वालों की, लो बेटी हुई....जो जन्म से ही अनमनी हो उसके जिस्म पर दर्द ही शोभा देता है। सर न उठा सके इसी फ़िराक में सहनशीलता की देवी का बिरुद थमा दिया सदियों पहले समाज के ठेकेदारों ने। उस धरोहर को संभालती स्त्री की परवाज़ आज भले चाँद तक पहुँच चुकी हो, पर कहीं न कहीं शामिल होती है मर्दाना अहं की सियासतों में।

बीत जाएगी और कई सदियाँ यूँहीं दर्द से लिपटे, पाखंडी समाज को मुखर स्त्री अच्छी तो लगती है, बशर्ते वह अपनी नहीं दूसरों की।

भावना ठाकर 'भावु' (बेंगुलूरु, कर्नाटक)